Wednesday, December 25, 2019

25 दिसंबर खास क्यों ?

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हमारा देश विभिन्न धर्मों और  संस्कृतियों का संगमस्थल है, विविधता में एकता का देश: भारत।

 और आज का दिन तो विशेष  दिन है क्योंकि आज 25 दिसम्बर को ईसाई धर्म का बड़ा दिन यानि कि क्रिसमस है तो,  हिन्दू धर्म में तुलसी पूजन दिवस/सिख धर्म में बलिदान दिवस/ महाराजा बिजली पासी की जयंती एवं महामना मदनमोहन मालवीय जी एवं अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिवस है।  
 योगदान और बलिदानियों को नमन एवं आपको शुभकामनाएं।

Our country is a confluence of different religions & cultures, a country of Unity in diversity.

 Today is really a big day as 25 December is the merry Christmas of Christianity, also Tulsi Pujan Day in Hinduism / Sacrifice Day in Sikhism / Birth Anniversary of Maharaja Bijli Pasi and the birthday of Mahamana Madan Mohan Malaviya ji and Shri Atal bihari Vajpayee ji ..wishes, congratulations, remembrance on this special day.

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Tuesday, December 24, 2019

Nostalgia, doordarshan, 90s, childhood : यादें बचपन 90 का दशक और दूरदर्शन


Doordarshan , 90s , बचपन: 

सालों हो गए कुछ लिखे हुए, अब हिंदी कीबोर्ड और इंटरनेट सुलभ और सस्ता होने से कंटेंट भी बढ़े हैं और यूज़र्स भी अब 2016 की दुनिया नहीं रही...
आज़कल हिंदी कोरा पर एक महीने से लिखना पढ़ना चल रहा है । 
अचानक से वहां पर एक सवाल मिला कि:

 दूरदर्शन का पहला सबसे लोकप्रिय धारवाहिक कौन सा था?

जवाब लिखते सोंचते एक अलग ही दुनिया मे पहुंच गया था सोंचा कि यहाँ भी शेयर करता हूँ.. शायद कोई भूले भटके यहां तक आये और पढ़ के उसे कुछ खुशी मिले....

अब तो बहुत सारे चैनलों की भीड़ में हम सबका नाता दूरदर्शन से कम हो गया है। और शायद कुछ ये भी सोंचे कि भई ये दूरदर्शन क्या बला है? हमें तो पता ही नहीं…धारावाहिक भी भला आते हैं क्या डीडी1 में ? कोई देखता भी क्या डीडी1 भला? पर हम तो भई हैं ओल्ड स्कूल वाले , 90s वाले, दूरदर्शन वाले, तो फिर चलिए सोंचते हैं….
सही मायनों में कहें तो दूरदर्शन का सुनहरा दौर गुज़र गया है.. और समय के साथ इसकी लोकप्रियता गुज़रे ज़माने की बात हो गयी है…सवाल का जवाब तलाशने के लिए भी गुज़रे जमाने मे जाने की ज़रूरत पड़ेगी…चलिए तो चलते है तलाश में…आखिर सभी को कुछ तलाश है….
ये सिग्नेचर ट्यून से करोड़ो की यादें जुड़ी हुई हैं, शायद बहुत से लोग अपनी अपनी यादों में लौट जाएं।
अब जब किसी के पास टीवी होगा तब ही न वो व्यक्ति दूरदर्शन या फिर कुछ और देख पायेगा। लेकिन भई 30–35 सालों पहले दूरदर्शन के जमाने मे तो अधिकतर घरों में टी वी भी नहीं हुआ करती थी…हां रेडियो ज़रूर हुआ करता था किंतु टी वी तो भई अमीर घरों की शोभा हुआ करती थी। तब कुछ धारावाहिक ऐसे आये जिन्हें देखने के लिए घरों में टीवी खरीदा जाने लगा, रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण को देखने के लिए ही इस देश के कई घरों में उनका पहला टीवी सेट खरीदा गया है। रंगीन टीवी और कार 1980 और 1990 के दशक तक अमीरी और वैभव की निशानी थी इस देश में। खुले व्यापार की नीति 1996 के आस पास आई और टीवी की दुनिया और हमारा देश तेजी से बदला…. जहां 90s तक के भारत के घरों में डायलर फोन भी नहीं हुआ करते थे वहीं आज हर घर के हर सदस्य की जेब मे स्मार्ट फोन और पर्सनल , रंगीन, मनचाहे प्रोग्राम दिखाने वाला टीवी है। पर पहले गिनती के घरों में ही ऐसे श्वेत श्याम यानी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी हुआ करते थे ….
आज किसी धारावाहिक की लोकप्रियता को नापने का एक स्पष्ठ पैमाना है TRP (टारगेट रेटिंग पॉइंट[1]https://en.m.wikipedia.org/wiki/Target_rating_point ) लेकिन दूरदर्शन के सुनहरे दौर में जब इस विशाल देश मे केवल एक ही चैनल उपलब्ध था उस समय पूरा देश , धर्म और नफरत की छुद्रता को त्यागकर रामायण और महाभारत देखता था .

इन धारावाहिकों ने वो कर दिया जो संविधान, धर्म और नेता लोग नहीं कर पाए , वो ये की इसने अमीरी गरीबी धर्म जाति आदि सारे वर्गीकरण और बंधनों को तोड़ दिया था। लगभग पूरे देश में लगभग हर कोई , क्या अमीर क्या गरीब सभी एक दूसरे का अपने घरों में दिल से स्वागत करते थे और सभी एक साथ बैठ कर रामायण और महाभारत देखते थे।[2]
1984 से 1987 के सालों में रामायण जब हर रविवार सुबह 9.30 बजे दूरदर्शन पे प्रसारित होता था तब सभी लोग अपने सारे काम धंधे निपटाकर या छोड़कर टीवी के आगे बैठ जाते थे तब गाँव कस्बों और शहरों के बाज़ारों में अघोषित कर्फ्यू जैसा माहौल हो जाता था।
कुछ सालों पहले ही रामायण को दुनिया का सबसे अधिक देखा (लगभग 200 मिलियन व्यूज[3] ) जाने वाला माइथेलॉजिकल धारावाहिक घोषित किया गया है[4]
तब उस 1980 और 1990s के दौर में हम भी प्राइमरी स्कूल के बच्चे हुआ करते थे और ज़िन्दगी बस स्कूल खेलकूद और दोस्तों में ही थी। तब शनिवार और रविवार का विशेष इंतज़ार होता था क्योंकि संडे को लगभग सभी बच्चे अंग्रेजी धारवाहिक स्पाइडरमैन और ही मैन[5] देखते थे , वैसे धारावाहिक में पात्र क्या कहते थे कुछ खास समझ तो नहीं आता था, पर देखने मे क्या मज़ा आता था आज किसी को समझा पाना मुश्किल है।
रात 8.40 को दूरदर्शन पर आता था समाचार , और लगभग वही समय सभी परिवारो के खाना खाने का समय होता था क्योंकि फिर 9 बजे से टीवी धारावाहिक आते थे -जैसे कि गुल गुलशन गुलफाम, इंतेज़ार, तलाश, काला जल, तमस, नीम का पेड़, नुक्कड़, फटीचर आदि सभी बहुत लोकप्रिय रहे हैं।
ये जो रविवार है न ये संडे बहुत खास होता था उस दौर के हम बच्चों के लिए क्योंकि डिज्नी के कार्टून्स आते थे डक टेल्स

टेल्सपिन

और आता था मोगली वाला द जंगल बुक जिसका टाइटल ट्रैक गुलज़ार का लिखा बालगीत उस दौर के हर बच्चे को याद होगा और वो बालगीत में एक मील का पत्थर है लकड़ी की काठी काठी पे घोड़ा ..वाले गीत की तरह.. शायद आपने भी सुना होगा तो धुन भी गूंजेगी कानों में इन शब्दों को पढ़ने से ….
जंगल जंगल बात चली है पता चला है,
चड्डी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है…

स्पेस सिटी सिग्मा, गायब आया , चंद्रकांता, शक्तिमान , मालदीव की कहानी स्टोन बॉय , जी साहब आदि का उल्लेख करूं तो शायद किसी को याद ही नही आएगा…पर सभी बेहद लोकप्रिय थे।
वैसे लोकप्रियता की बजाय उल्लेखनीय और प्रभावी हिंदी धारावाहिकों की बात करें तो भारत एक खोज [6] , विक्रम वेताल, मालगुडी डेज , चाणक्य, सुरभि, बातों बातों में, उल्टा पुल्टा , मुंगेरीलाल के हसीन सपने, और फ्लॉप शो , भारतीय शेरलॉक होम्स यानी ब्योमकेश बक्शी करमचंद औरतहकीकात , महिला सशक्तिकरण के बेहतरीन चित्र प्रस्तुत करने वाले धारावाहिक रजनी , उड़ान, शांति और प्राइवेट चनलों को टक्कर देते विदेशी सोप ओपेरा की तर्ज़ वालेस्वाभिमान आदि जैसे कई धारावाहिक आते हैं।[7]
वैसे 1984 में शुरू हुए हिंदी के पहले डेली सोप ओपेरा हम लोग को या भारत पाकिस्तान बंटवारे की पृष्ठभूमि पर बने धारावाहिक बुनियाद भी पहला लोकप्रिय धारवाहिक कहा जा सकता है किंतु जो आंदोलनकारी मास अपील रामायण और महाभारत को लेकर थी वो इनमें नहीं थी । शायद उन सालों तक टीवी की पहुंच और पेनेट्रेशन आम जनमानस तक न होकर उच्च मध्यमवर्ग वाले इलीट क्लास तक ही थी।
रामानंद सागर ने अपनी बीमारी के दिनों में रामायण , आध्यात्म और भक्ति से नई ऊर्जा प्राप्त की थी। वो ऊर्जा सभी को देने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे फलतः देश के 16 से भी ज्यादा भाषाओं के रामायणों का अध्य्यन कर रामायण धारावाहिक का निर्माण किया था । उन दिनों न तो कोई VFX जैसी चीज ही थी और न ही टीवी सीरिअल्स के निर्माण में कंप्यूटर का ज्यादा दखल , सो तीर टकराने जैसे दृश्य आज हास्यास्पद प्रतीत होते हैं पर उस दौर में वो कौतूहल का विषय होते थे। और रामायण को इतने विस्तृत ढंग से, जन जन तक उनकी सरल अभिव्यक्ति ऑडियो विसूअल रूप में पहुंचाने में इस धारावाहिक का बहुत बड़ा योगदान माना जाना चाहिए। लोकप्रियता ऐसी थी कि कलाकारों की लोग पूजा करते थे, कुछ तो चुनावों में खड़े होकर संसद तक भी पहुंच गए।
संगीत के कार्यक्रमों में चित्रहार भी रात 8 बजे जब आता था लोग अपने अपने घरों की तरफ भागते दिखते थे। फिर 1989 में शुरू हुआ रंगोली भी आजतक लोकप्रिय और पसंद किया जाने वाला कार्यक्रम हैं। अब संगीत की बात हो और ग़ज़लों का जिक्र न हो ऐसा संभव नहीं, तो दूरदर्शन में ही गुलज़ार और जगजीत सिंह जी के बनाये मिर्ज़ा ग़ालिब और कहकशां टीवी धारावाहिक बन कर आये जो कि एक नायाब मोती है ग़ज़ल प्रेमियों के लिए।
1987 में रामायण के समाप्त होने के बाद 1988 में बी आर चोपड़ा की महाभारत शुरू हुई जिसने रामायण की लोकप्रियता को भी पार कर दिया था, और उसे रामायण से भी ज्यादा व्यूवरशिप मिली हुई है । बाद में उत्तर रामायण भी आयी किन्तु देर रात्रि के स्लॉट में उसे वो लोकप्रियता नहीं मिल पाई जिसकी उम्मीद थी।
पर हां हम आपसे एक बात तो कहना भूल ही गए , घबराइए नहीं ,हमें कुछ नहीं चाहिए, हम बस इतना चाहते हैं कि आप बारातियों का स्वागत पान पराग से करें! …पान पराग, पान मसाला, पान पराग.…" ..कहने का मतलब है कि अगर उस दौर का जिक्र हो और ऐसे ही कुछ लोकप्रिय टीवी कॉमर्शियल का जिक्र न हो तो बात अधूरी सी लगेगी… क्योंकि उस दौर के टीवी कमर्शियल तक लोगों के ज़ेहन में बैठे हुए हैं उनपे चर्चा न करना भी एक अधूरेपन का एहसास कराएगा…वाशिंग पाउडर निरमा हो यालक्ष्मण सिल्वेनिया का स्लोगन "पूरे घर को बदल डालूंगा"या बजाज बल्ब का "जब मैं बिल्कुल छोटा था बड़ी शरारत करता था मेरी चोरी पकड़ी जाती…जब रोशन होता बजाज " और सिंकारा, रसना के टीवी कमर्शियल भी ध्यान से देखे जाते थे..और अगर कभी लोकप्रिय टी वी कमर्शियल्स की बात निकलेगी तो लोकप्रियता के पैमाने पर इन ऐडवेरताइजमेंट्स का अलग ही स्थान रहेगा…भले ही इनकी लोकप्रियता की बड़ी वजह आज के जैसे चैनल बदलने के ऑप्शन का उस समय उपलब्ध न होना भी है….अब क्या करें इनका इलाज गोलियां नही …(90s का हसीन दौर था वो…..और था कभी न लौट के आने वाला निश्छल प्यारा बचपन! सब गुज़र गया …😢…
जैसे कि :
तुम गए, सब गया ,
मैं अपनी ही मिट्टी तले , दब गया !
(सरल से सवाल का जवाब ढूंढ़ते हुए कब 90s और बचपन की यादों में डुबकी लगा के इतना सारा लिखा गया ध्यान नहीं रहा, जवाब की तलाश में काफी व्यक्तिगत भी हो गया हूँ , पढ़ने वालों से अनुरोध है की कृपया इस लंबे जवाब के बारे में मुझे अपनी पसंद नापसंद और प्रतिक्रिया कृपया अवश्य बताएं, बहुत खुशी होगी।)
धन्यवाद , शुक्रिया , करम, मेहरबानी, Thank you!💐