Friday, May 13, 2022

राह पे रहते हैं, यादों में बसर करते हैं, खुश रहो अहले वतन , अब हम तो सफर करते हैं..

राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं ,
खुश रहो अहले वतन, हम तो सफर करते हैं ..
जल गये जो धूप में तो साया हो गये -
आसमाँ का कोई कोना ले थोड़ा सो गये 
जो गुज़र जाती है बस उसपे गुज़र करते हैं 

उड़ते पैरों के तले जब बहती हैं जमीं -
मुड़के हमने कोई मंज़िल देखी ही नहीं ,
रात दिन राहों पे हम शामो सहर करते हैं 
हो राह पे रहते हैं..

ऐसे उजड़े आशियाने तिनके उड़ गये,
बस्तियों तक आते आते रास्ते मुड़ गये ,
हम ठहर जायें जहाँ उसको शहर कहते हैं..
राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं,
खुश रहो अहले वतन अब, हम तो सफ़र करते हैं..

1982 की फ़िल्म नमकीन में गुलज़ार का लिखा ये सफ़राना  गीत संजीव कुमार पर ट्रक चलाते हुए फिल्माया गया था, नायक एक ट्रक ड्राइवर जो है। गाना बचपन में पहले सुन लिया था और इसका वीडियो यानी फ़िल्म बहुत बाद में देख पाया।  ऐसा बहुत से गीतों के साथ हुआ है और हर बार लगा है कि गाना और भी बहुत अच्छे से फिल्माया जा सकता था क्योकि मन में कुछ और ही तस्वीर बन चुकी थी। सो लगा कि इस वीडियो से तो गीत के भाव की पूरी अभिव्यक्ति नहीं हो पाई। भावसंप्रेषण बहुत बड़ी कला है और हमेशा बेहतरी की गुंजाइश होती ही है। 
फ़िल्म नमकीन जो कि गुलज़ार की सिग्नेचर फ़िल्म में से एक है। यह बांग्ला साहित्यकार समरेश बसु की कहानी पर आधारित है। 
सोंचता हूँ तो लगता है कि आज का सिनेमा ऐसी सरल और सामयिक कहानी कह ही नहीं पाता , क्योंकि शायद व्यावसायिक सिनेमा की अपनी सीमाएं हैं, किंतु भारत में अव्यावसायिक या कला फिल्मों में भी क्या इतना अकाल है? 
गुलज़ार जैसे लेखक विचारक ही ऐसे आम जीवन को गहराई से देख समझ सकते हैं और फिर उसे गीतों और फिल्मों में ढाल कर यूँ पेश कर सकते हैं की हर किसी को सोंचने पर ऐसा  मजबूर भी कर दे कि दर्शक का व्यक्तिगत विचार भी आगे बढ़कर समृद्ध हो और साथ ही मनोरंजन भी हो।  निस्संदेह गुलज़ार एक बहुत बड़े story teller हैं।

वजह बेवजह घूमने वाले और मंजिल की तलाश में चलने और सफर करने वाले के लिए बहुत से शब्द हैं राही, यात्री, traveller, explorer, wanderer , जोजोबोर (असमिया)  यायावर आदि बहुत से शब्द हैं सबके अपने अपने मतलब भी हैं और specific किस्म के यात्री को इंगित करते है।
 
*देखें तो हम सब अपनी जीवन यात्रा में चल रहे एक यात्री और यायावर ही तो हैं।*

गुलज़ार और उनकी कृतियों पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। वैसे सरल सादी सी हिंदी फ़िल्म देखने का शौक हो तो नमकीन ज़रूर देखें , मेरी तो फेवरेट है।
(फ़िल्म नमकीन की स्टोरी कुछ यूं है : हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से पर्वतीय गाँव में एक ट्रक ड्राइवर गेरुलाल (संजीव कुमार) आता है। स्थानीय ढाबे वाला धनीराम, गेरुलाल को एक वृद्धा ज्योति (वहीदा रहमान) के घर पर एक कमरा किराज़े पर दिलवा देता है। ज्योति की तीन बेटियां हैं- सबसे बड़ी... निमकी (शर्मिला टैगोर), मंझली... मिट्ठु (शबाना आज़मी) और सबसे छोटी चिनकी (किरण वैराले)। धीरे धीरे गेरुलाल, चारों महिलाओं के नजदीक आ जाता है और घर के सदस्य जैसा हो जाता है। वह निमकी से प्रेम करने लगता है परंतु वह शादी करने से इंकार कर देती है और गेरुलाल से कहती है कि उसे मिट्ठु से शादी कर लेनी चाहिये। गेरुलाल को वहाँ से जाना पड़ता है।
कुछ बरस बीत जाते हैं और एक बार गेरुलाल की मुलाकात नौटंकी में नाचने वाली स्त्री से होती है। यह चिनकी है जो अब अपने पिता किशनलाल के साथ रहती है। चिनकी से गेरुलाल को पता चलता है कि पिछले तीन बरसों में निमकी और बहनों की कोई खोज खबर न लेकर उसने गलती की है। वह गाँव में जाता है तो निमकी को अकेले रहते पाता है। ज्योति और मिट्ठु, दोनों ही मर चुकी हैं। गेरुलाल निमकी को अपने साथ ले आता है। फ़िल्म को आर॰ डी॰ बर्मन के अच्छे संगीत के लिये भी जाना जाता है।) 
फ़िल्म देखकर ये लगा की इसका नाम आखिर 'नमकीन' रखने का सोंचना और सचमुच में यही नाम रखना भी बहुत बड़ी बात है।