Friday, November 18, 2022

तेरी ख़ुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...

'तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे ...'

8 शब्दों में महागाथा है ये. करोड़ों के दिल के करीब .


ऐसी नायाब नज़्म लिखने वाले उर्दू के बड़े शायर राजेन्द्र नाथ 'रहबर' साहब ने पिछले रविवार 13.11.2022 को इस फानी दुनिया से रुख़सती ले ली है।

 वे 91 बरस के थे। रहबर साहब ने 70 सालों तक उर्दू अदब की ख़िदमत की। वे खासे पढ़े लिखे भी थे पर शायरी का शौक उन्हें ग़ज़लों और नज्मों की दुनिया में ले आया। अदब को लेकर उनकी ईमानदारी और जज्बे को उनके इस शे'र में देखा जा सकता है -

"ये नस्ल-ए-नौ को अंदाज़ा नहीं है,
के अदब में चोर दरवाज़ा नहीं है...."

(नस्ल-ऐ-नौ = नयी नस्ल, नए युवा, new youth
अंदाज़ा= सम्भावना की जानकारी, estimate
अदब= इज़्ज़त, औपचारिकता, manner 
चोर दरवाज़ा= गुप्त रास्ता, escape route, bypass route)

रहबर साहब की ये नज़्म 'तेरे खुशबू में बसे ख़त...' को बहुत ज्यादा शोहरत मिली। इसे जगजीत सिंह जी ने धुन में पिरोया और आवाज दी तथा  30 सालों तक दुनिया भर में इसे गाया है,  ग़ज़ल प्रेमियों के बीच ये बेहद ही  लोकप्रिय है। इस नज्म को फ़िल्म निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी फ़िल्म 'अर्थ' में रखा और फिल्माया था।
Love is life..and it adds lot of colurs in life..

 आज रहबर साहब को आखिरी सलाम बतौर उनकी यह नज्म पेश है।


मोहब्बत और खुलूस दिलों में जिंदा रखिये, और थोड़ा सा साहित्य भी, यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।