As a normal and common human being gone and going lots of sentiments. This blog is just a step to share some thoughts and a plateform to express and share some thoughts by hoping that this will help you to think feel and act to make a small social change and make this world a more better place to Live...
Thursday, April 23, 2020
विश्व पुस्तक दिवस पर एक विचार
मस्तिष्क की टेम्पररी मेमोरी के विचारों को प्रतीको के माध्यम से पेरमानेंट मेमोरी मे रेप्लिकेट करना और उनकी कई प्रतियाँ बना लेना कोई मामूली परिवर्तन नहीं था, यह मानव सभ्यता के लिए एक क्रांति थी। हम खुद के ही विचार जीवित रहते भूलते रहते हैं ( इसीलिए लोगो को टू-डू लिस्ट बनानी पड़ती है, कलेंडर मे जन्म दिन और सालगिरह वगैरह डालकर रिमाइंडर लगाना पड़ता है, रासन की लिस्ट बनानी पड़ती है)। मृत्यु के साथ विचार भी दफन हो जाते हैं; (जरूर उसमे से कुछ अपने आस पास के लोगों द्वारा अगली पीढ़ी को चले जाते है)। जब लेखन नहीं था, तो कितना मुश्किल रहा होगा, मेरे कुछ विचार हैं उन्हे कोई सुनना नहीं चाहता है, लेकिन मेरा सुनाने का मन है, तो क्या करूँ। कोई सुनता भी है, तो याद नहीं रख पाता है, कोई याद भी रख पाता है तो विचार मे घालमेल कर देता है। करोड़ो लोग जो जा चुके हैं, उनके अनुभव से अर्जित ज्ञान को किताबें संचित रखती हैं, उन अनुभवों का एक सूक्ष्म हिस्सा भी हम व्यक्तिगत अनुभव से हाँसिल नहीं कर सकते। इसलिए ज्यादा से ज्यादा किताबें पढे, वह उससे कई गुना ज्ञान दे सकती हैं जो हम व्यक्तिगत अनुभव से जीवन भर मे नहीं प्राप्त कर सकते हैं। किताबों का चुनाव भी एक मुद्दा है लेकिन उस पर फिर कभी।...
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