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Friday, January 15, 2021

बाज़ार से गुज़रा हूं खरीददार नहीं हूं..अकबर इलाहाबादी एक गज़ल

*दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ,*
*बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीददार नहीं हूँ..*

*ज़िन्दा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी,*
*हर चंद कि हूँ होश में, होशियार नहीं हूँ..*
(तलबगार= इच्छुक, चाहने वाला;  ज़ीस्त= जीवन; लज़्ज़त= स्वाद; )

*इस ख़ाना-ए-हस्त से गुज़र जाऊँगा बेलौस,*
*साया हूँ फ़क़्त, नक़्श बेदीवार नहीं हूँ..*
(ख़ाना-ए-हस्त=अस्तित्व का घर; बेलौस= लांछन के बिना;  फ़क़्त= केवल; नक़्श= चिन्ह, चित्र)

*अफ़सुर्दा हूँ इबारत से, दवा की नहीं हाजित,*
*गम़ का मुझे ये जो’फ़ है, बीमार नहीं हूँ..*
(अफ़सुर्दा= निराश; इबारत= शब्द, लेख; हाजित(हाजत)=आवश्यकता; जो’फ़(ज़ौफ़)= कमजोरी, क्षीणता)

*वो गुल हूँ ख़िज़ां ने जिसे बरबाद किया है,*
*उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ..*
(गुल= फूल;  ख़िज़ां= पतझड़; ख़ार= कांटा)

*यारब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से,*
*मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूँ..*
(महफ़ूज़=सुरक्षित; इनायत=कृपा;  तलबगार=इच्छुक)

*अफ़सुर्दगी-ओ-जौफ़ की कुछ हद नहीं “अकबर”,*
*क़ाफ़िर के मुक़ाबिल में भी दींदार नहीं हूँ..*
(अफ़सुर्दगी-ओ-जौफ़= निराशा और क्षीणता; क़ाफ़िर= नास्तिक;  दींदार=आस्तिक,धर्म का पालन करने वाला)

शायर: अकबर इलाहाबादी

यह गज़ल बहुत ही फेमस है, इतनी कि  कभी कभी हिंदी उर्दू भाषी लोगों में आम बोल चाल की भाषा में मुहावरे कि तरह प्रयोग हो जाती है। किन्तु समझेंगे तो पाएंगे कि पूरी गज़ल का कैनवस बहुत बड़ा है, और अर्थ बहुत सारे और बहुत ही गहरे निकलते हैं।

उनकी बहुत सी शायरी बड़ी अच्छी है।
जैसे कि  ये कुछ...
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा तक नहीं होती...

हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है, 
चोरी तो नहीं की है, डाका तो नहीं डाला है..
हर ज़र्रा चमकता है अनवर ए इलाही से,
हर सांस ये कहती है,  कि हम हैं तो खुदा भी है..

हर एक से सुना नया फसाना हम ने , 
देखा एक दुनिया में नया जमाना हमने..

जब ग़म हुआ चढ़ा ली दो बोतलें इकट्ठी,
मुल्ला की दौड़ मस्जिद, अकबर की दौड़ भट्ठी..

दर्द को दिल में जगह दो अकबर,
इल्म से शायरी नहीं होती...

जो कहा मैंने कि प्यार आता है मुझको तुम पर,
हंस के कहने लगे कि और आपको आता ही क्या है..

मजहबी बहस मैंने की ही नहीं, 
इतनी अक्ल मुझमें थी ही नहीं..

इश्क नाजुक मिजाज है बेहद, अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता,
होश ए आरिफ की है यही पहचान, कि खुदी में समा नहीं सकता...

धन्यवाद!