Sunday, February 19, 2023

माँ सुनाओ मुझे वो कहानी...

माँ सुनाओ मुझे वो कहानी,
जिसमें राजा ना हो ना हो रानी..

जो हमारी तुम्हारी कथा हो,
जो सभी के ह्रदय की व्यथा हो,
गंध जिसमें भरी हो धरा की,
बात जिसमें ना हो अप्सरा की,
हो ना परियाँ जहाँ आसमानी...

जो किसी भी ह्रदय को हिला दे,
आदमी आदमी को मिला दे,
आग कुछ इस तरह की लगा दे,
आग में भी माधुरी मिला दे,
जो सुने हो चले पानी पानी..

वो कहानी जो हँसना सिखा दे,
पेट की भूख को जो भुला दे,
जिसमें सच की भरी चाँदनी हो,
जिसमें उम्मीद की रोशनी हो,
जिसमें ना हो कहानी पुरानी,
माँ सुनाओ मुझे वो कहानी....


-lyrics by नन्दलाल पाठक, Singer: Siza Roy, 
Album: Cry for CRY, Year-1991, Composer artist: Jagjit Singh , label : HMV SAREGAMA 
किस्से ,कहानी, और बातें बहुत सी हैं, हर बात पर एक बात है। पर क्या किस्से , कहानियों , मिथकों चमत्कारों से विकट समस्याओं का समाधान है? ये एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। ऐसे ही जब कहीं कभी कोई भूखा बच्चा भूख की आग से लड़ता , हंसी और खुशी को तरसता बच्चा , क्या सोचता होगा इस बात को इस कवि नंदलाल पाठक ने सोंचा और लिखा.. । न जाने कैसे किस तरह से ये गीत जाने माने मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह तक पहुंचा होगा और उन्हें इस गीत ने छुआ होगा। फिर उनके अलकेमिस्ट वाले दिल, दिमाग, हुनर और हाथों ने इसे जब गोद ले लिया तो फिर ये गीत शिज़ा रॉय की आवाज में जो बनकर आया, फिर तो न जाने कितनों के दिल को रुला कर, करोड़ों की आंखों से नायाब आँसू बनके बहा होगा पता नहीं...
 
ये गीत CRY FOR CRY नाम से HMV सारेगामा के एक ग़ज़ल अल्बम में साल 1991 आया था। सारे गीत गहरे दुख लिए हुए थे। सुना था कि इसकी कमाई बच्चों के लिए काम करने वाली NGO संस्था CRY (Child Rights and You) को दिया  जाना पहले ही तय किया गया था, इसलिए ही इस एल्बम का नाम ये रखा गया। 


ये है इस नायाब गीत ग़ज़ल की youtube लिंक -  https://youtu.be/ZwF73004LmM

और ये जगजीत सिंह के गाये एक live version का link :  

वैसे बहुतों ने इसे अपने अपने ढंग, ढब और समझ से गाया है..बेहद पसंद में से एक रहा है ये..हमेशा से।

Friday, January 6, 2023

क्यूँ दुनिया का नारा- जमे रहो? क्यों दुनिया का इशारा जमे रहो... तारे जमीन पर.. फ़िल्म साहित्य विचार हम और विरोधाभास

Every Child is special!  साल 2007 की हिंदी फ़िल्म तारे जमीन पर को बहुत सी बातों के लिए याद रखा जा सकता है, उसके गीतों के लिए भी। 

एक ये गीत भी है। -   

दुनिया का नारा- जमे रहो!
मंजिल का इशारा- जमे रहो!
दुनिया का नारा - जमे रहो!
मंजिल का इशारा- जमे रहो!
इस गीत के पहले भाग में एक आदर्श एवं अनुशासित जीवन की झलक दिखाई गई है तो वहीं गीत के दूसरे भाग में एक खिलंदड़ जिज्ञासु और एक विपरीत अनादर्श जीवन की झलक दिखलायी गयी है। दोनो ही एक दूसरे के पूरक एवं विरोधाभाषी है। a big contradiction!!! 

गीत के बोल हैं- 
कस के जूता, कस के बेल्ट,
खोंस के अन्दर अपनी शर्ट,
मंजिल को चली सवारी,
कंधो पे ज़िम्मेदारी..

हाथ में फाइल मन में दम
मीलों मील चलेंगे हम
हर मुश्किल से टकरायेंगे
टस से मस ना होंगे हम!

दुनिया का नारा- जमे रहो!
मंजिल का इशारा- जमे रहो!
दुनिया का नारा - जमे रहो!
मंजिल का इशारा- जमे रहो!

ये सोते भी हैं Attention
आगे रहने की है Tension
मेहनत इनको प्यारी है
एकदम आज्ञाकारी हैं (आज्ञाकारी हैं)

ये ऑमलेट पर ही जीते हैं, 
ये टोनिक सारे पीते हैं,
वक़्त पे सोते, वक़्त पे खाते,
तान के सीना बढ़ते जाते..

दुनिया का नारा- जमे रहो!
मंजिल का इशारा- जमे रहो!
दुनिया का नारा- जमे रहो,
मंजिल का इशारा-जमे रहो!
-----
यहाँ अलग अंदाज़ है,
जैसे छिड़ता कोई साज़ है,
हर काम को टाला करते हैं,
ये सपने पाला करते हैं!

ये हरदम सोचा करते हैं,
ये खुद से पुछा करते हैं-
क्यूँ दुनिया का नारा - जमे रहो?
क्यूँ मंजिल का इशारा - जमे रहो?
क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो?
क्यूँ मंजिल का इशारा जमे रहो?

ये वक़्त के कभी गुलाम नहीं,
इन्हें किसी बात का ध्यान नहीं,
तितली से मिलने जाते हैं,
ये पेड़ों से बतियाते हैं!

ये हवा बटोरा करते हैं,
बारिश की बूँदें पढ़ते हैं,
और आसमान के कैनवास पे,
ये कलाकारियाँ करते हैं..

क्यूँ दुनिया का नारा- जमे रहो?
क्यूँ मंजिल का इशारा जमे रहो?
क्यूँ दुनिया का नारा जमे रहो?
क्यूँ मंजिल का इशारा जमे रहो..


ध्यान दीजियेगा की आदर्श अनुशासित वाला पार्ट तेज गति और शोर से भरा हुआ है किंतु रचनात्मक और अनादर्श को दिखाने वाला भाग एकदम से स्लो टेम्पो के साथ शान्ति ले आता है और फिर वापस शोर की तरफ जाता है। गीत में कवि कहीं भी जजमेंटल नहीं हुआ है कि- ये अच्छा है और ये बुरा! पर क्या समाज में हम व्यवहारिक रूप से ऐसे हैं? सोंचने वाली बात है न??? 
अच्छे सवाल , अच्छे जवाब तक पहुंचाते हैं और एक बेहतर दुनिया बनाते हैं...और यह भी याद रखें कि- हर बच्चा खास है!

गाने के लिंक्स और डिटेल्स नीचे हैं, सुनियेगा..
Song Name: Jame Raho
Album: Taare Zameen Par,
Year: 2007 
Singer(s): Vishal Dadlani, shankar mahadevan
Starcast: Aamir Khan, Tanay Chheda, Darsheel Safary, Tisca Chopra
Composer: Shankar-Ehsaan-Loy, Lyrics: Prasoon Joshi
YouTube Link:  https://youtu.be/VofN1x93TG0

Saturday, December 3, 2022

आदमी बुलबुला है पानी का,

आदमी बुलबुला है पानी का.. , अच्छी कहानियां और यादें बनाएं , जीवन क्षणभंगुर है :
 
एक फिल्मी गाना है , एक जमाने में दूरदर्शन के चित्रहार में खूब आता था, तो खूब सुना है, पर इसके अर्थ पर उस  उम्र में बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया, देना चाहिए था..सुन के देखियेगा। गीत है- 
 आदमी मुसाफिर है , 
आता है , जाता है ,
आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है..

ये हिंदी फिल्मी गीत जीवन के गहरे अर्थ बताने वाला दार्शनिकता का भाव लिए हुए है। 

जीवन है तो मृत्यु भी है.., फ़िल्म मैट्रिक्स में इसपर एक प्रभावी quote है कि-  हर शुरआत का एक अंत है.. , दार्शनिक कहते हैं कि हार जीत और सबकुछ को ही उसकी संपूर्णता में स्वीकारना चाहिए , यानी अच्छे को भी और बुरे को भी। रिश्तों में, लोगों में तथा जीवन में हम सब अक्सर अच्छा अच्छा ही चाहते हैं, केवल सुख और  अमृत ही चाहिए, दुख कड़वाहट और विष नहीं..

 Netflix पर रिलीज हुई फ़िल्म Good Bye देखिएगा...इसकी अधिकतर समीक्षाओं में एक्टिंग को, निर्देशन को, संवादो को या स्क्रिप्ट को रिव्यू करते है वैसा ही किया सबने..पर

Good Bye फिल्म में रिव्यू तो दरअसल मृत्यु का करना चाहिए था, कि जब कोई अपना इस दुनिया से चला जाता है तो दूसरे कैसे रिएक्ट करते हैं, और अपनों को क्या फील होता है..? दिखाया सब है लेकिन कही न कही बात थोड़ी अधूरी रह गई है ऐसा लगता है..!
इसी विषय पर इससे पहले हाल फिलहाल में दो फिल्मे और आई हैं ' रामप्रसाद की तेरहवीं' और 'पगलैट'..

हिंदुओ में मृत्यु के बाद तेरह दिनों के शोक में क्या क्या घटता है ये इन तीनों फिल्मों में मौजूद है..
मुझे पर्सनली इन तीनों फिल्मों में 'पगलैट' ही जिंदगी और वास्तविकता के ज्यादा करीब लगी.

गुड बाय में सबने अच्छा अभिनय किया है, महानायक अमिताभ बच्चन भी हैं और 'पुष्पा' वाली रश्मिक मंधाना भी हैं फ़िल्म में..मैने कुछ रिव्यूज देखे लेकिन किसी ने सुनील ग्रोवर के किरदार का जिक्र तक नहीं किया जबकि.. मेरे हिसाब से इस फ़िल्म में वह पात्र सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है..
ये किरदार महसूस करने वाला है ज्यादा है, बयान करने वाला कम..
मैं थोड़ी कोशिश करता हूं इसको बयान करने की..क्योंकि मैने इसे शायद ज्यादा गहराई से महसूस किया है..

हरीश भल्ला(अमिताभ बच्चन) की पत्नी का निधन हो चुका है और उनकी अस्थियों को लेकर गंगा में विसर्जित करने पूरा परिवार जा रहा है..जिस पंडित को ये अंतिम क्रिया करनी है वो महसूस करता है कि घर की बेटी तारा  इन रीत रिवाजो को लेकर नाखुश है, और इसे ढोंग मानती है..इन सबमें वैज्ञानिक कारण खोजती है..
पंडित बने सुनील ग्रोवर जो कुछ भी इस लड़की को कहते है वो ही इस पूरी फिल्म का सार शिक्षा और मोरल है..!
बल्कि यूं कहे कि फ़िल्म ही नहीं बल्कि पूरे जीवन का सार है..!

पंडित बने सुनील ग्रोवर उन्हे महाभारत की एक कहानी सुना कर बताते हैं कि हम अस्थियां विसर्जित क्यो करते हैं...? ताकि मनुष्य को उसके पापों से, उसके बुरे कर्मो से मुक्ति मिल सके..!
लड़की पंडित जी से असहमति प्रकट  करती है और बोलती है कि माफ कीजिए पंडित जी हम अस्थियां इसलिए प्रवाहित करते हैं क्योकि उसमे फॉस्फेट होता है जो हमारी खेती और मिट्टी की उर्वरता के लिए अच्छा होता है.. बाकी आप जो कह रहे हैं ये सब तो अंधविश्वास है..और वो वहां से उठकर चली जाती है...!
पंडित उनकी बात सुनकर गुस्सा नहीं होते..फिर रास्ते में सुनील ग्रोवर इस लड़की को कहते हैं कि..तारा जी आप बिल्कुल सही कह रही हैं, कि सब साइंस है , लेकिन ये साइंस की बात कितनी बोरिंग है न.?  ना तो इसने आपकी परेशानियों से आपका ध्यान हटाया, ना ही कोई दर्शन या climax  मिला, और ना ही आप इतनी दूर से गंगा में अस्थियां विसर्जन करने इसलिए आई हैं कि गंगा का पोषण हो सके..! 
दरअसल ये कहानियां ही हैं जो दुनिया चलाती हैं..! कहानियों से लंबी उमर ना आपकी है, न मनुष्य की , ना डायनासोर की ,
और ना हो इस दुनिया की..!
बस कहानी सुनो और बच्चो को अपना वर्शन सुनाओ..!
लड़की कहती है- पर बहुत सी कहानियां और बाते एकदम  बकवास और खयाली लगती हैं। पंडित उसको कहते हैं-हमें दर्शन और कहानियां अक्सर खयाली काल्पनिक लगती हैं, क्यूँकि हम उन्हे समझने की वैसी  कोशिश नही करते..!
आप अपनी मां गायत्री जी के बारे में क्या याद करेंगी? उनकी छोटी-छोटी बाते ही ना..? या इसमें भी कोई साइंस है ..?? यही याद करोगी ना कि उन्होंने ये किया, वो किया..?
सुनो,  आपकी माँ गायत्रीजी इस धरती पर पहले भी बहुत बार आकर चली गई हैं, पर इस जन्म में तुम्हारे लिए अपनी छोटी छोटी कहानियां छोड़ कर चली गई हैं।
बस यही एक वाक्य पूरे जीवन का सार है..!!
कहानियां हमारी उम्मीद है जीवन का संचार है..जीवन की आस है..

किसी को कयामत का इंतजार है कि अल्लाह आयेगा और हिसाब मांगेगा, किसीको दुबारा इस खूबसूरत दुनिया में बार बार आने की आस है और बीच मे बस RIP (rest in peace) है, क्योंकि वो इस दुनिया को छोड़ना नही चाहता..मोह है, माया है!

महाभारत भी एक उम्मीद है और रामायण भी..
अर्जुन जब अभिमन्यु के मरने का शोक नही मिटा पाता तो कृष्ण बोलते हैं कि  तुम इस दुख से बाहर क्यो नहीं निकलते..? 
अर्जुन बोले- अगर मैं वहां उस क्षण रणभूमि में मौजूद होता तो अपने पुत्र को बचा लेता..!
कृष्ण बोले फिर..?
...फिर क्या करते..??
फिर क्या तुम्हारा पुत्र सदा के लिए जीवित रहता..?
..अर्जुन नही निकले इस दुख से तो कृष्ण उन्हे स्वर्ग ले गए, कि चलो तुमको तुम्हारे पुत्र से मिलवा देते हैं , 
कृष्ण अर्जुन को स्वर्ग ले गए..
वहां उन्होंने अपने पुत्र अभिमन्यु को देखा, एक बड़े सिंहासन पर बैठे सुंदर वस्त्रों से सुशोभित, अर्जुन देखकर बड़े प्रसन्न हुए और दौड़कर गले मिले.
 अभिमन्यु ने पूछा आप कौन हैं..??
अर्जुन अवाक रह गए..बोले- पुत्र मैं तुम्हारा पिता अर्जुन हूं..
अभिमन्यु  हंसे और बोले- ना जाने कितने जन्म मैं तुम्हारा पिता रहा हूं, और ना जाने कितने जन्म आप मेरे पिता रहे. 
मैं किस किस जन्म को याद करूं..?
हे अर्जुन! जो भी हमारे आपके बीच संबंध है वो सब उसी धरती पर ही है अन्यथा और कहीं नहीं, और वो वहीं समाप्त हो जाते हैं।  इसलिए आप दुखी न हों!  ये मिलन आगे भी हमारा कहीं ना कहीं होता ही रहेगा ..

ऐसे ही बुद्ध का एक किस्सा है: बुद्ध के पास एक बूढ़ी स्त्री रोते हुए आई, तुम ज्ञानी हो मेरे पुत्र को दुबारा जीवित कर दो , मुझसे ये शोक सहन नही हो रहा,
बुद्ध बोले- ठीक है मां , जाओ पहले उस घर से एक लकड़ी ले आओ जिस घर में कोई मृत्यु को  प्राप्त ना हुआ हो.  
बूढ़ी स्त्री ममता के वशीभूत खो कर खुश हुई कि एक न एक घर तो मिल ही जायेगा जहां कभी कोई मरा ना हो..सुबह से शाम हो गई पर ऐसा कोई घर नही मिला जहां किसी न किसी का परिजन मृत्यु को प्राप्त ना हुआ हो..!
बुद्ध की बात अब उस स्त्री को समझ आ चुकी थी...
ये कहानियां ही हैं, पर ये जो कहानियां हैं, ये मन की अशांत नदी में ठहराव लाती हैं, इसमें तर्क लाने या साइंस खोजने का कई बार कोई मतलब नहीं बनता..!!.हम मनुष्य हैं, रोबोट नहीं.., 
मनुष्य शब्द मन से बना है,
बहुत से धर्मो में मनुष्य को मिट्टी का पुतला कहा गया है, कि मिट्टी में ही इसे मिल जाना है।
हिंदू धर्म में इस मिट्टी के पुतले को मनुष्य कहा गया है , इस मनुष्य शब्द का अर्थ डिक्शनरी में आपको शायद ठीक ठाक नहीं मिलेगा..
ये जो मन है, बस यही जीवन है..यही संसार है..
अगर आप ये पढ़ रहे हैं तो इसका एक  मतलब ये है कि- जारी है आपका जीवन, और मृत्यु भी तथा आपकी कहानियां भी...अच्छी कहानियाँ और यादें  बनाइये , संसार से हमें एक दिन चले जाना है, और अन्ततः कहानियों को ही रह जाना हैं।... चलो एक बेहतर दुनिया बनाएं! 🌈
🙏🏻

Friday, November 18, 2022

तेरी ख़ुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...

'तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे ...'

8 शब्दों में महागाथा है ये. करोड़ों के दिल के करीब .


ऐसी नायाब नज़्म लिखने वाले उर्दू के बड़े शायर राजेन्द्र नाथ 'रहबर' साहब ने पिछले रविवार 13.11.2022 को इस फानी दुनिया से रुख़सती ले ली है।

 वे 91 बरस के थे। रहबर साहब ने 70 सालों तक उर्दू अदब की ख़िदमत की। वे खासे पढ़े लिखे भी थे पर शायरी का शौक उन्हें ग़ज़लों और नज्मों की दुनिया में ले आया। अदब को लेकर उनकी ईमानदारी और जज्बे को उनके इस शे'र में देखा जा सकता है -

"ये नस्ल-ए-नौ को अंदाज़ा नहीं है,
के अदब में चोर दरवाज़ा नहीं है...."

(नस्ल-ऐ-नौ = नयी नस्ल, नए युवा, new youth
अंदाज़ा= सम्भावना की जानकारी, estimate
अदब= इज़्ज़त, औपचारिकता, manner 
चोर दरवाज़ा= गुप्त रास्ता, escape route, bypass route)

रहबर साहब की ये नज़्म 'तेरे खुशबू में बसे ख़त...' को बहुत ज्यादा शोहरत मिली। इसे जगजीत सिंह जी ने धुन में पिरोया और आवाज दी तथा  30 सालों तक दुनिया भर में इसे गाया है,  ग़ज़ल प्रेमियों के बीच ये बेहद ही  लोकप्रिय है। इस नज्म को फ़िल्म निर्देशक महेश भट्ट ने अपनी फ़िल्म 'अर्थ' में रखा और फिल्माया था।
Love is life..and it adds lot of colurs in life..

 आज रहबर साहब को आखिरी सलाम बतौर उनकी यह नज्म पेश है।


मोहब्बत और खुलूस दिलों में जिंदा रखिये, और थोड़ा सा साहित्य भी, यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Friday, October 7, 2022

जोश : how is the Josh ???

How is the जोश!!! ?  

हिन्दी फिल्मी गीतों में कुछ गीत हैं जो जोश से भर देते हैं। इसी जोश के चक्कर मे लगभग हर शादी की बारात में एक गीत "ये देश है वीर जवानों का .." जरूर ही बजता है , जिसमें गीत के बोल से कहीं अधिक 'मायने' उसकी धुन एवं संगीत से उत्पन्न जोश होता है। 

मानव मन की भावना को 'रस' कहा जाता है , यहीं से 'रसिया' शब्द की उत्पत्ति हुई है ( रूस वाला Russia मत समझ लीजियेगा..).  'भाव' मन की स्थिति है जबकि रस उस भाव से उत्पन्न होने वाला सौंदर्य/स्वाद है. रस को ही सजीवों, कला एवं साहित्य का प्राणतत्व माना जाता है। मनुष्य की भावनाओं को कला एवं साहित्य प्रमुखतः 8-9 वर्गों में वर्गीकृत करता है। साहित्य एवं कला में रस उत्पत्ति को सबसे पहले परिभाषित करने का श्रेय भरत मुनि को जाता है जिन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक नाट्यशास्त्र (नाट्यकला की प्राचीनतम पुस्तक) में 8 प्रमुख रसों एवं उनके स्थायी भाव बताए हैं जो की ये हैं : 
रति (Love)
हास्य (Mirth)
शोक (Sorrow)
क्रोध (Anger)
उत्साह (Energy)
भय (Terror)
जुगुप्सा (Disgust)
विस्मय (Astonishment)

हिंदी साहित्य में भी इसी तरह सिर्फ नौ रस (emotions, भाव) बताए गए हैं जो मनुष्य के अंदर भिन्न भिन्न भावना जगाते हैं.  वो 9 रस एवं उनसे जुड़े   भाव ये हैं: 

वीभत्स रस (घृणा, जुगुप्सा)
हास्य रस (हास)
करुण रस (शोक)
रौद्र रस (क्रोध)
वीर रस (उत्साह)
भयानक रस (भय)
श्रृंगार रस (रति)
अद्भुत रस (आश्चर्य)

अभिनेता संजीव कुमार की  1974 की एक प्रसिद्ध फ़िल्म थी 'नया दिन नई रात ' जिसमें संजीव कुमार ने 9 रोल(किरदार) अदा किये थे एवं उनका हर रोल (चरित्र) इन्ही रसों में से एक का प्रतिनिधित्व (represent) करने वाला था। पहले के जमाने में लोग सिर्फ गाने सुनने, अपने प्रिय कलाकार को देखने,  ड़बल रोल देखने आदि के लिए भी सिनेमा हॉल जाते थे। उस फिल्म का एक गीत " मैं वही, वही बात, मेरे लिये तो हर दिन , नया दिन,  हर रात नयी रात.." भी अच्छा एवं लोकप्रिय रहा है। 
वैसे श्रृंगार रस को रसराज (रसों का राजा) कहा जाता है क्यूंकि इसका उपयोग बहुत व्यापक है। 

 एक फिल्मी गीत " ज़िद्दी है , ज़िद्दी है, दिल ये ज़िद्दी है.." पिछले दिनों सुना जो जोरदार लगा। इसके गायक विशाल डडलानी को आपने सोनी टीवी पर आने वाले संगीत के रियालटी शो  indian idol में  जरूर देखा सुना होगा।  इस गीत की बाकी की पूरी टीम सामान्य जनता के लिए अंजानी सी ही है। 

 बेहद अलग से , अलग अलग लम्बाई (मीटर) के शब्दों/वाक्यों को जो ठीक से जुगलबंदी भी न कर रहे हों, ऐसे बोलों को सुंदर धुन और संगीत में पिरोना किसी म्यूजिक कंपोजर के लिए जरा टेढ़ा और कठिन कार्य होता होगा।  फ़िल्म की कहानी से जोड़ता और बहुत से भावों से भरा हुआ अद्भुत  गीत है ये।
Song Title/गाना: जिद्दी दिल Ziddi Dil
Movie: Mary Kom(Year-2014)
Singer/गायक: Vishal Dadlani
Music Director/संगीतकार: Shashi Suman
Lyrics Writer/गीतकार: Prashant Ingole
Star casts/अभिनीत किरदार: Priyanka Chopra, Sunil Thapa, Darshan Kumar
Music Label: Zee Music)

गीत में किशोर कुमार की तरह की  याडलिंग भी है, मोहित चौहान की तरह की आवाज में खराश भी है..कुल मिलाकर अच्छा जोशीला गीत है, ज़रा ध्यान से सुनिएगा.. , आशा है पसंद आएगा..और जोश को  High रखने में निश्चित ही मददगार होगा...

उल्लास में रहें, जोश में रहें, उड़ते रहें ...और संगीत सुना करें, क्योंकि संगीत मन को पंख लगाए...

बहुत बहुत  शुभकामनाएं!🌈

Thursday, October 6, 2022

world is market दुनिया एक बाजार:

Often every product,service or idea has some pros and cons. Smart marketers presents their products and services to the world in many different interesting ways.  Most of the time, such amazing and unbelievably beautiful dreams draws a rosy picture in your mind that shaken your thought process and you remember it too. 
 Most of the advertisements focus on the benefits and shows beautiful dreams of the meaningful changes that will come in life from the effect of that product.. Tempting erotic Beauties in men's shaving razor blades ads are popular but height is watching an erotic exposing sexy in a cement ads...., X Laga Dala To Life Jhingalala..,  Thanda Means Coca Cola!! (really??)  
 The clever advertiser avoids including the Cons of his product/services/idea/to the target audience in the sales pitch.. However, prepares for Objection Handling for a doubtful prospects If the prospect asks.  Sometimes Price is crucial, critical and a big  barrier b/n  seller & customer then sandwich method is used which is a good popular option and is used by telebrands kind of TV ads.
The world is full of examples of  advertisements because this world is transforming into a market, where sometimes you are the customer, sometimes a catalyst and sometimes the marketer too! So, you must be going through many such tempting advertisements, getting attracted and confused every day...which one you found attractive, tempting, clever..??
अक्सर हर उत्पाद एवं सेवा के कुछ न कुछ पक्ष और विपक्ष होते हैं।  चतुर  मार्केटर अपने उत्पादों और सेवाओं को कई अलग-अलग रोचक तरीकों से दुनिया के सामने पेश करते हैं। ज्यादातर तो ऐसे आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय से हसीन सपने दिखाते हैं कि आपका दिमाग हिल जाए और आप उसे याद भी रखें। ज्यादातर विज्ञापन लाभों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उस प्रोडक्ट के प्रभाव से जीवन में आने वाले सार्थक परिवर्तनों के हसीन सपने दिखाते हैं .. मर्दों के दाढ़ी बनाने वाले  विज्ञापन में हसीनाएं,  सीमेंट के विज्ञापन में भी कामुक हसीनाएं,   X लगा डाला तो लाइफ झिंगालाला , ठंडा मतलब कोका कोला ऐसे ही विज्ञापनों के उदाहरणों से दुनिया भरी पड़ी है क्योंकि दुनिया के बाजार में कभी आप ग्राहक हैं तो कभी विज्ञापन को आगे बढ़ने वाले उत्प्रेरक और कभी कभी मार्केटर भी! अतः ऐसे ही अनेकों लुभावने विज्ञापनों से आप रोज गुज़रते, आकर्षित होते और भ्रमित होते रहते होंगे..थोड़ा दिमाग पर जोर डालकर याद कीजिये और बताइए कि अभी अभी किस विज्ञापन ने आपको दिवास्वप्न दिखाया..
  
चतुर विज्ञापनदाता अपने उत्पाद एवं विचार के विपक्ष को सेल्स पिच में दिखाने बताने से बचता है.. यद्यपि  ऑब्जेक्शन हैंडलिंग के तहत इस पर वृहत विचार करकर तैयारी जरूर रखता है ताकि सशंकित इच्छित ग्राहक के संशय को दूर करके उसे अपना ग्राहक बनाया जा सके। यदि संभावना पूछती है। कई बार अधिक बिक्रीमूल्य भी बेचनेवाले और ग्राहक के बीच बड़ी दीवार होती है जो उसे  उत्पाद/सेवा लेने से रोकती है तब सैंडविच विधि का प्रयोग किया जाता है जो कि एक अच्छा प्रचलित विकल्प है तथा टीवी के telebrands आदि द्वारा इसका प्रयोग किया जाता है।

Thursday, September 29, 2022

Facts and Aspects (तथ्य एवं पहलू) :

Facts , aspects and world : 
एक होता है Fact और उससे निकलते हैं कई opinions! जब एक ही aspect को पकड़कर opinion बना लें और उस पर ही जोर दें  "की भैया यही बात सही है बाकी अन्य सभी aspects तो हैं ही नहीं या गौण हैं"  तब वो opinion आ जाता है ज्ञान की श्रेणी में। 

A man's most valuable trait is a judicious sense of what not to believe....
Euripides (A great Roman Philosopher) 

" एक मनुष्य की सबसे मूल्यवान विशेषता उसका वह तर्कपूर्ण विवेकबोध है जो उसे यह बताता है कि किस बात पर विश्वास करना है, और किस बात पर विश्वास नहीं करना है। "
ऐसा ही कुछ सूचना संचार, कम्युनिकेशन और कंप्यूटर की इन्फॉर्मेशन डेटा आदि के बारे में पढ़ते पढ़ाते वक़्त हम सभी पढ़ते हैं किन्तु आम जीवन में इस छोटी सी किन्तु महत्वपूर्ण बात को लगभग भूल ही जाते हैं। और फैक्ट के एक अतिमहत्वपूर्ण aspect को dilute कर opinions के जाल बुनते रहते हैं तथा फंसते भी रहते हैं। 
संशय यानी dilemma , यानी अनिर्णय की स्थिति को यूँ तो अच्छा नहीं माना जाता किन्तु इसे इतना भी बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि शायद कोई भी इससे बच न सका। 
अर्जुन की ऐसी ही संशय वाली परिस्थितियों पे कृष्ण का दिया गया गीता का ज्ञान है तो लगभग सारे advertisements के soft targets भी वही संशय वाली मानसिकता है।

जहाँ जहाँ चुनाव एवं विकल्प हैं वहां वहां संशय है जिससे पार पाने के लिए और सही चुनाव की बुद्धिमत्ता यानि कि 'intelligency' काम आती है। 

वैसे ये भी एक opinion और  'ज्ञान' हो गया न?