Thursday, April 22, 2021

usual suspect : जाहिर सा दोषी

फिल्म usual suspect  में  एक पात्र वर्बल किंट कुजन को बताता है, की  "शैतान ने जो सबसे बड़ी चाल निकाली वह उस दुनिया को समझा रही थी जिसका वह अस्तित्व नहीं था।" 
 "The greatest trick the devil ever pulled was convincing the world he didn't exist. 
 मैकक्वेरी ने उस पंक्ति को परिभाषित किया, जिसे मूल रूप से "शैतान की सबसे अच्छी चाल के रूप में लिखा गया था कि वह आपको बताए कि वह मौजूद नहीं है" फ्रांसीसी कवि चार्ल्स बौडेलेर द्वारा।
Verbal Kint tells Kujan, "The greatest trick the Devil ever pulled was convincing the world he didn't exist." McQuarrie paraphrased the line, which was originally written as "The finest trick of the devil is to persuade you that he does not exist" by French poet Charles Baudelaire.


Wednesday, April 21, 2021

the Minimalist : सादा जीवन उच्च विचार

थोड़ी सी ज़मीं, थोड़ा आसमां,
तिनकों का बस इक आशियां...
Minimalism : 
इंसान की जरूरतें बहुत सीमित हैं। लेकिन, लालच का कोई अंत नहीं। किसी ने कहा है कि पृथ्वी के पास इतना कुछ है की हर पृथ्वीवासी की ज़रूरतें पूरी कर सकती हैं किन्तु ,किन्तु लालच यानी कि greed ऐसी चीज है कि अगर एक इंसान भी लालच में आ जाए तो पूरी पृथ्वी और सारे जीव मिलकर भी उस एक आदमी का लालच पूरा नहीं कर सकते...
  यूं तो मिनिमलिज्म के बारे में थोड़ा बहुत मैं पहले भी जानता था। लेकिन, हाल ही में Netflix पर मैंने एक फिल्म देखी : मिनिमलिस्ट। 
फिल्म को देखकर कुछ बातें समझ आईं। उन्हीं को आपके साथ साझा कर रहा हूं। वास्तव में अगर हम अपने आस-पास ध्यान गड़ाएं तो हमें चीजों  का अंबार दिखाई देगा..। तमाम किस्म की वस्तुएं। बाजार हमारे अंदर हर क्षण असंतोष पैदा करता है। यह असंतोष व्यवस्था के प्रति नहीं है। यह असंतोष वस्तुओं के प्रति है। हम जो फोन इस्तेमाल कर रहे हैं। उससे असंतुष्ट हैं। जो लैपटाप इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे असंतुष्ट हैं। हमें अपनी कार छोटी लगती है। हमें अपना घर छोटा लगता है। टीवी का स्क्रीन छोटा है और उसमें फीचर भी बहुत ही कम है। हर फैशन के हिसाब से हमारे पास कपड़े नहीं हैं। 
हर चीज के प्रति असंतोष को उकसाने के बाद बाजार हमें उसे खरीद लेने के लिए उकसाता है। दुनिया के बहुत उन्नत किस्म के दिमाग इसमें लगे हुए हैं कि कैसे किसी को असंतुष्ट किया जाए, फिर उसे खरीदने के लिए उकसाया जाए। हम अपने फोन के सत्तर फीसदी फीचर्स का इस्तेमाल नहीं करते या मामूली इस्तेमाल करते हैं। हमारे लैपटाप की क्षमताओं का बीस फीसदी इस्तेमाल भी नहीं हो पाता। फिर भी बाजार हमें कहता है कि अब नया वर्जन आ गया है। इसे ले लो। हासिल कर लो।
आपने देखा होगा कि कैसे आईफोन के नए वर्जन के लिए लोगों की पहले से कतारें लग जाया करती थीं और लोग दुकान खुलने का इंतजार किया करते थे। जब लोग ऐसे नहीं खरीद पाते तो बाजार हमें बताता है कि कीमतें बहुत कम हो गई हैं। अब अगर चूक गए तो फिर कभी नहीं खरीद पाएंगे। बाजार हमारे अंदर एक लत पैदा करता है। यह एक तरह का एडिक्शन है। यकीन मानिये कि शराब और अफीम से कम यह एडिक्शन नहीं है। इस एडिक्शन के मारे लोग अपने आसपास तमाम किस्म की संपत्ति जमा करते, वस्तुओं का अंबार लगाते हुए, खुद से ऊबे हुए, अपने रिश्तों से ऊबे हुए, अपनी जिंदगी से ऊबे हुए, हमारे आसपास ऐसे तमाम लोग दिखाई दे जाते हैं। 

बच्चे जिस समय छोटे रहते हैं, उस समय जो भी उनकी केयर करता है, उनके साथ समय बिताता है, उससे वे जीवन भर सबसे ज्यादा लगाव महसूस करते हैं। आज हमने अपना विकल्प उन्हें पकड़ा दिया है। उन्हें मोबाइल और आईपैड पकड़ा दिया है। वे अपने मां-बाप से कम और मोबाइल और आईपैड से ज्यादा लगाव महसूस कर रहे हैं। उसके साथ ज्यादा समय बिताते हैं। इसमें बच्चों का भला क्या दोष। यह एडिक्शन तो हम खुद उनमें पैदा कर रहे हैं। 

दुनिया में एक विचार शृंखला है। मिनिमलिस्टों की। इसे सादा जीवन उच्च विचार भी कह सकते हैं। इसे थोड़ी सी जमीन-थोड़ा आसमान, तिनकों का बस इक आशियां भी कह सकते हैं। दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो अपना सब कुछ सिर्फ एक पिट्ठू में बांधकर निकल पड़ते हैं। वे अपने सामान की सूची बनाते हैं कि किन सामानों के बिना उनका काम नहीं चलेगा और पता चलता है कि ऐसे सामानों की सूची सचमुच बेहद कम है।
 मुझे नहीं लगता है कि उनका जीवन हमसे कम संतोषदायक नहीं होता होगा। वे भरपूर जीवन जीते हैं। अपने आसपास वस्तुओं का अंबार लगाने की बजाय वे दुनिया और जीवन के अनुभवों का अंबार लगाते हैं। हर क्षण समृद्ध होते हैं। 
अपने वार्डरोब में ऐसे कपड़ों को जमा करने से क्या फायदा, जिन्हें कभी पहना नहीं जाने वाला है। ऐसे पैसे जोड़ने से क्या फायदा, जिसका उपयोग नहीं किया जाने वाला। जिंदगी बहुत  कीमती है और जीवन जीने के लिए सिर्फ एक बार मिलता है।  
सचमुच जरूरतें बहुत सीमित हैं। एक बार गंभीरता से उस पर सोचा तो जाना ही चाहिए। 
बाजारवाद के राक्षस की जान भी इसी तोते में छिपी है। इसकी गर्दन मरोड़ने की जरूरत है। 
हमारा जीवन अनुभवों से हरा-भरा हो। वस्तुओं से घिरा-घुंटा न हो।🌈
बस एक छोटा सा विचार था , फेसबुक में पढ़ा ,अच्छा लगा सो यूं ही किसी और के विचार्स  को जोड़कर लिख दिया।  आशा है पसंद आया होगा। पढ़ने के लिए धन्यवाद! 
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Saturday, April 17, 2021

FACT, प्रचार and THE TRUTH:

एक होता है फैक्ट और एक होता है प्रचार...

प्रचार यह है कि स्प्राइट प्यास बुझाता है लेकिन फैक्ट यह है कि स्प्राइट सोडा है और आपको डीहाइड्रेट करता है जिससे वापस प्यास लगती है।
प्रचार यह है कि मैगी 2 मिनट में बनती है लेकिन फैक्ट यह है कि 2 मिनट में तो पानी भी नही उबलता है।

प्रचार यह है कि सिख बटर चिकन खाते है लेकिन फैक्ट यह है कि सिख सबसे ज़्यादा शाकाहारी कौम है भारत मे।

प्रचार यह है कि मुस्लिम देशद्रोही होते है लेकिन फैक्ट यह है कि पकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में पकड़े गए 95 फीसदी से ज़्यादा नॉन मुस्लिम है।

असल मे बात यह नही कि आप क्या हो...बात यह है कि आपको प्रचारित किस तरह किया जाता है।

इसी तरह एक यह भी की ब्राह्मण शाकाहारी होते है लेकिन दक्षिण और पूरब में ऐसे भी ब्राह्मण है जो पारंपरिक मांसाहारी होते है।

प्रचारित करना ही आज का सबसे बड़ा हथियार है, प्रचार करने से आप सामने वाले के मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर सकते हो। एड फ़िल्म, विज्ञापन जगत की बड़ी बड़ी बातें इसी सिद्धान्त पर काम करती है।

एक बार कब्ज़ा हो गया तो आप उससे किसी बलात्कारी के समर्थन में भी रैली निकलवा सकते हो, उसको हत्यारा भी बना सकते हो और सबसे बड़ी बात उसकी जिंदगी झंड कर सकते हो लेकिन वो हमेशा ज़िंदगी झंड का जिम्मेदार जॉन लिंग उंग ली को मानेगा,

आपको नहीं!

इसलिए प्रचार में मत जाओ, नही तो स्प्राइट ऐसा डी हाइड्रेट करेगी कि आप स्प्राइट के चक्कर मे 10 लीटर पानी बर्बाद करके भी अपनी प्यास नही बुझा पाओगे।

Friday, April 2, 2021

सितारे उल्का :

टूटा सितारा तो , मांगा था रब से ,
तुझको ही जान-ऐ-वफ़ा...
जो टूट जाएं; तारे तमाम , 
मांगू वही इक दुआ...
ये तो 90s का एक रोमांटिक फिल्मी गाना था जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था , जतिन-ललित ने स्वरबद्दध किया था और उदित नारायण और अमित कुमार ने गाया था , स्क्रीन पे आपने देखा होगा कि एक तारा टूटने पे नायक शाहरुख खान नायिका को पा लेने की प्रार्थना करता है। ..पर दुखद की फ़िल्म में नायक विश पूरी नहीं हो पाती...☹ ज़रूर तारे में कोई लोचा था...
ज़रा वैज्ञानिक इन्वेस्टीगेशन करें क्या? 😉

अब आते है मूल वैज्ञानिक प्रश्न पर...
विज्ञान की तरह सोंचते हैं कि आखिर : 
रात को तारे टूटने की घटना असल में क्या होती है? इसके पीछे क्या कारण है???

सन् 1801 में खगोल वैज्ञानिकों द्वारा एक आकाशीय पिंड खोजा गया जो सूर्य की परिक्रमा करता है. उस समय से अब तक डेढ़ हजार से भी अधिक पिंडो की खोज की जा चुकी है. इन पिण्डों को छुद्र ग्रह यानि एस्टेरॉयड कहा जाता है.

मंगल ग्रह और बृहस्पति ग्रह के मध्य विस्तृत अंतरिक्ष क्षेत्र है जहां पर यह छुद्र ग्रह निवास करते हैं और वहीं पर इनकी परिक्रमण कक्षाएं होती है. इस विस्तृत क्षेत्र को एस्टेरॉयड बेल्ट के नाम से जाना जाता है.

यह छुद्र ग्रह समय-समय पर आपस में टकराते रहते हैं फलस्वरूप कुछ सूक्ष्म टुकड़े इनसे उत्पन्न होते है. इन सूक्ष्म टुकड़ों को उल्काणु यानी मीटियोराइट कहते हैं.

छुद्र पिण्डों मे टक्कर के बाद उत्पन्न हुए उल्काणु (छोटा द्रव्यमान) का वेग अधिक होता है (p=m*v) . तथा यह याद्रिक्क्षया (randomly) पूर्वक सभी दिशाओं में जा सकते हैं. यह उल्काणु प्रायः तमाम आकाशीय पिण्डो से टकराकर नष्ट हो जाते हैं. उदाहरण के तौर पर, चन्द्रमा, पृथ्वी तथा मंगल से टक्कर. यह टक्कर इन पिंडो पर गर्त (क्रेटर) का निर्माण कर देता है.

जब उल्काणु पृथ्वी के वायुमंडल मे होकर गुजरता है तो वायुमंडल मे व्याप्त वायु/आयन के घर्षण के कारण उनमे से अधिकांश उल्काणु प्रकाश के साथ जल उठता हैं, जिन्हें उल्का कहा जाता है. यह मुड़ी हुई(वृक्षोपम) प्रकाश की एक लकीर के रुप में दिखाई देती है. सामान्य बोलचाल मे इसे लोग टूूटता तारा कहते है. अधिकांश उल्काएं भू-सतह से लगभग 100 किलोमीटर ऊपर दिखाई पड़ने लगती हैं तथा भू-सतह से 60-65 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचते-पहुंचते लुप्त् हो जाती हैं। अधिकांश उल्काओं का वेग लगभग 40 किलोमीटर प्रति सेकंड होता है. प्रकाश की ये लकीरे चन्द सेकंड के लिए होती है, किन्तु यह 1 मिनट तक हो सकता है. कुछ उल्काणु पृथ्वी पर पहुचने में सफल हो जाते है जिन्हें उल्का पत्थर कहते है.

तथ्य :-

:) कुछ उल्का पत्थरो मे मौजूद रेडियोधर्मी खनिजों के विश्लेषण से पता चला है कि इनका निर्माण साढे चार अरब वर्ष पूर्व हुआ था.

:) हर 24 घंटा औसतन लगभग 2 करोड़ उल्काएं पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय जल जाती हैं.

:) कभी-कभी एक घंटे में लाखों की संख्या में उल्काएं पृथ्वी के वायुमंडल में जलकर भस्म होती हैं । इस घटना को उल्कापात कहा जाता हैं । ऐसी घटना हर साल लगभग एक ही समय पर घटती हैं।

:) उल्काणु ,कृत्रिम उपग्रह के लिए ख़तरनाक हो सकते हैं. (यदि टक्कर हुआ तो उपग्रह की अन्त तय है)

और हां साइकी 16-दीर्घ स्वर्णिम छुद्र ग्रह  भी है जो सोने से बना हुआ  और इतना बड़ा है कि पृथ्वी के प्रत्येक लोगो को अरबपति बना सकता है. (यदि पृथ्वी पे गिरा तो .. 😇)

ध्यान से पढ़ने के लिए आभार एवं ढेर सारा प्यार ❤,  क्या है न कि न पढ़ने वाले बहुत से बड़े बच्चों को ऐसे ही फिल्मी चाशनी से लपेटकर पढ़ाना पड़ता है...😊 

धन्यवाद ! Have a nice time..TC