टूटा सितारा तो , मांगा था रब से ,
तुझको ही जान-ऐ-वफ़ा...
जो टूट जाएं; तारे तमाम ,
मांगू वही इक दुआ...
ये तो 90s का एक रोमांटिक फिल्मी गाना था जिसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था , जतिन-ललित ने स्वरबद्दध किया था और उदित नारायण और अमित कुमार ने गाया था , स्क्रीन पे आपने देखा होगा कि एक तारा टूटने पे नायक शाहरुख खान नायिका को पा लेने की प्रार्थना करता है। ..पर दुखद की फ़िल्म में नायक विश पूरी नहीं हो पाती...☹ ज़रूर तारे में कोई लोचा था...
ज़रा वैज्ञानिक इन्वेस्टीगेशन करें क्या? 😉
अब आते है मूल वैज्ञानिक प्रश्न पर...
विज्ञान की तरह सोंचते हैं कि आखिर :
सन् 1801 में खगोल वैज्ञानिकों द्वारा एक आकाशीय पिंड खोजा गया जो सूर्य की परिक्रमा करता है. उस समय से अब तक डेढ़ हजार से भी अधिक पिंडो की खोज की जा चुकी है. इन पिण्डों को छुद्र ग्रह यानि एस्टेरॉयड कहा जाता है.
मंगल ग्रह और बृहस्पति ग्रह के मध्य विस्तृत अंतरिक्ष क्षेत्र है जहां पर यह छुद्र ग्रह निवास करते हैं और वहीं पर इनकी परिक्रमण कक्षाएं होती है. इस विस्तृत क्षेत्र को एस्टेरॉयड बेल्ट के नाम से जाना जाता है.
यह छुद्र ग्रह समय-समय पर आपस में टकराते रहते हैं फलस्वरूप कुछ सूक्ष्म टुकड़े इनसे उत्पन्न होते है. इन सूक्ष्म टुकड़ों को उल्काणु यानी मीटियोराइट कहते हैं.
छुद्र पिण्डों मे टक्कर के बाद उत्पन्न हुए उल्काणु (छोटा द्रव्यमान) का वेग अधिक होता है (p=m*v) . तथा यह याद्रिक्क्षया (randomly) पूर्वक सभी दिशाओं में जा सकते हैं. यह उल्काणु प्रायः तमाम आकाशीय पिण्डो से टकराकर नष्ट हो जाते हैं. उदाहरण के तौर पर, चन्द्रमा, पृथ्वी तथा मंगल से टक्कर. यह टक्कर इन पिंडो पर गर्त (क्रेटर) का निर्माण कर देता है.
जब उल्काणु पृथ्वी के वायुमंडल मे होकर गुजरता है तो वायुमंडल मे व्याप्त वायु/आयन के घर्षण के कारण उनमे से अधिकांश उल्काणु प्रकाश के साथ जल उठता हैं, जिन्हें उल्का कहा जाता है. यह मुड़ी हुई(वृक्षोपम) प्रकाश की एक लकीर के रुप में दिखाई देती है. सामान्य बोलचाल मे इसे लोग टूूटता तारा कहते है. अधिकांश उल्काएं भू-सतह से लगभग 100 किलोमीटर ऊपर दिखाई पड़ने लगती हैं तथा भू-सतह से 60-65 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचते-पहुंचते लुप्त् हो जाती हैं। अधिकांश उल्काओं का वेग लगभग 40 किलोमीटर प्रति सेकंड होता है. प्रकाश की ये लकीरे चन्द सेकंड के लिए होती है, किन्तु यह 1 मिनट तक हो सकता है. कुछ उल्काणु पृथ्वी पर पहुचने में सफल हो जाते है जिन्हें उल्का पत्थर कहते है.
तथ्य :-
:) कुछ उल्का पत्थरो मे मौजूद रेडियोधर्मी खनिजों के विश्लेषण से पता चला है कि इनका निर्माण साढे चार अरब वर्ष पूर्व हुआ था.
:) हर 24 घंटा औसतन लगभग 2 करोड़ उल्काएं पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय जल जाती हैं.
:) कभी-कभी एक घंटे में लाखों की संख्या में उल्काएं पृथ्वी के वायुमंडल में जलकर भस्म होती हैं । इस घटना को उल्कापात कहा जाता हैं । ऐसी घटना हर साल लगभग एक ही समय पर घटती हैं।
:) उल्काणु ,कृत्रिम उपग्रह के लिए ख़तरनाक हो सकते हैं. (यदि टक्कर हुआ तो उपग्रह की अन्त तय है)
और हां साइकी 16-दीर्घ स्वर्णिम छुद्र ग्रह भी है जो सोने से बना हुआ और इतना बड़ा है कि पृथ्वी के प्रत्येक लोगो को अरबपति बना सकता है. (यदि पृथ्वी पे गिरा तो .. 😇)
ध्यान से पढ़ने के लिए आभार एवं ढेर सारा प्यार ❤, क्या है न कि न पढ़ने वाले बहुत से बड़े बच्चों को ऐसे ही फिल्मी चाशनी से लपेटकर पढ़ाना पड़ता है...😊
धन्यवाद ! Have a nice time..TC
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