एक होता है फैक्ट और एक होता है प्रचार...
प्रचार यह है कि स्प्राइट प्यास बुझाता है लेकिन फैक्ट यह है कि स्प्राइट सोडा है और आपको डीहाइड्रेट करता है जिससे वापस प्यास लगती है।
प्रचार यह है कि मैगी 2 मिनट में बनती है लेकिन फैक्ट यह है कि 2 मिनट में तो पानी भी नही उबलता है।
प्रचार यह है कि सिख बटर चिकन खाते है लेकिन फैक्ट यह है कि सिख सबसे ज़्यादा शाकाहारी कौम है भारत मे।
प्रचार यह है कि मुस्लिम देशद्रोही होते है लेकिन फैक्ट यह है कि पकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में पकड़े गए 95 फीसदी से ज़्यादा नॉन मुस्लिम है।
असल मे बात यह नही कि आप क्या हो...बात यह है कि आपको प्रचारित किस तरह किया जाता है।
इसी तरह एक यह भी की ब्राह्मण शाकाहारी होते है लेकिन दक्षिण और पूरब में ऐसे भी ब्राह्मण है जो पारंपरिक मांसाहारी होते है।
प्रचारित करना ही आज का सबसे बड़ा हथियार है, प्रचार करने से आप सामने वाले के मस्तिष्क पर कब्ज़ा कर सकते हो। एड फ़िल्म, विज्ञापन जगत की बड़ी बड़ी बातें इसी सिद्धान्त पर काम करती है।
एक बार कब्ज़ा हो गया तो आप उससे किसी बलात्कारी के समर्थन में भी रैली निकलवा सकते हो, उसको हत्यारा भी बना सकते हो और सबसे बड़ी बात उसकी जिंदगी झंड कर सकते हो लेकिन वो हमेशा ज़िंदगी झंड का जिम्मेदार जॉन लिंग उंग ली को मानेगा,
आपको नहीं!
इसलिए प्रचार में मत जाओ, नही तो स्प्राइट ऐसा डी हाइड्रेट करेगी कि आप स्प्राइट के चक्कर मे 10 लीटर पानी बर्बाद करके भी अपनी प्यास नही बुझा पाओगे।
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