सड़ते पूँजीवाद के कारण आपके आसपास बहुत कुछ बड़ी तेज़ी से बदल रहा है। आर्थिक बदलाव जैसे बेरोज़गारी का बढ़ना, जॉब क्रिएशन का घटते जाना, अमीरी और गरीबी के बीच का फ़ासला बड़ा होते जाना, मध्य वर्ग की मुश्किलें बढ़ते जाना आदि तो आसानी से दिखाई दे जाता है लेकिन जज़्बाती और सामाजिक बदलाव अमूमन आसानी से नज़र नहीं आते, लेकिन जब आप इधर ध्यान देते हैं तो आपको दिखाई पड़ता है कि आपके इर्द गिर्द की दुनिया तेज़ी से बदल रही है।
शहरों में पड़ोसी फ्लैट या मकान में कौन रहता है, उनके हालात कैसे हैं आदि पर तवज्जो देना बहुत पहले ख़त्म हो गया था, सोसाइटीज में रहने वालों के बीच भी रिश्ते व्यवस्था को लेकर तो हैं लेकिन जज़्बाती रिश्ते यहाँ भी कमज़ोर हुए हैं। इस तरह के बदलाव सबसे ज़्यादा गाँवों में नज़र आते हैं, ख़ासतौर पर अगर आप शहरों में आबाद हो गए हैं और लंबे समय बाद गाँव जाते हैं तो आप इन बदलावों को आसानी से देख पाएंगे।
गाँवों में अब लोग पड़ोसी के घर नहीं बल्कि चाय की दुकान पर बैठते हैं। खेती का सारा काम मशीनों के हवाले हो चुका है तो पूरे साल का काम एक सप्ताह में निपट जाता है, ऐसे में लोगों के पास खूब समय है। टीवी हर घर में हैं और जो ज़हर वो उड़ेल रहा है, उसे यहाँ सच माना जाता है। इसका नतीजा ये हुआ है कि मज़हबी बुनियादों पर यहाँ भी दूरियाँ बढ़ने लगी हैं। चाय की दुकानों पर होने वाली चर्चा टीवी पर आने वाली कुश्ती से तय हो रही है।
एक और बड़ा परिवर्तन हुआ है, हर समझदार आदमी को लग रहा है कि ऐसी चर्चा से बचना चाहिए, ऐसे में नुक्कड़ की इस चर्चा में सिर्फ साम्प्रदायिक नफरत से संक्रमित लोग बचते हैं, अक़्ल की बातें करने वालों के लिए ये जगह सुरक्षित नहीं रही।
पारिवारिक बदलाव और ज़्यादा परेशान करने वाले हैं। अभी 20-25 साल पहले परिवार भावनात्मक सुरक्षा का सबसे बड़ा केंद्र या पनाहगाह था, अब इसमें तेज़ी से बदलाव हो रहा है। भाइयों के बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं, बहुएं बुजुर्गों से दूर रहना चाहती हैं, जॉब की वजह से औलादों और उनके वालिदैन के बीच की दूरियाँ बढ़ रही हैं। बच्चों के पालन पोषण में परिवार के सदस्यों की भूमिका बहुत अहम है, उन्हें चाचा, ताया, दादी नानी और अपने जैसे दूसरे बच्चों के बीच रहकर प्रेम की जो पाठशाला मयस्सर थी, अब नहीं है। बच्चे और बूढ़े सबसे ज़्यादा असुरक्षित हैं और ये असुरक्षा लगातार बढ़ती जा रही है।
पूँजीवादी निज़ाम में सबकुछ आपके ज़ेब के वज़न से तय होता है, लेकिन ज़ेब का वज़न लगातार कम होता जाता है, ऐसे में पारिवारिक और सामाजिक जीवन भी तहस नहस हो रहा है। इस बिखराव का नतीजा है अवसाद और अवसाद से पैदा होने वाली बीमारियां। बीमारियां जिसकी दवा उद्योग को ज़रूरत है।
इस तरह पूँजीवाद आपसे वो सब कुछ छीन रहा है जो एक इंसान के रूप में आपने सदियों में अर्जित किया है। ये आपकी और आपके तहज़ीब की हत्या कर रहा है, चूँकि ये हत्या बेहद योजनाबद्ध और सॉफिस्टिकेटेड तरीके से किया जा रहा है इसलिए आप बिना किसी चीख़ पुकार के मरे जा रहे हैं, कमाल तो ये है कि ख़ुद को मारने में सहयोग भी दे रहे हैं।
सोचिये और इस बारे में अपने अनुभव और अवलोकन शेयर कीजिये। परस्पर विचार-विमर्श से शायद हम ख़ुद को, समाज को और इस दुनिया को इन ज़हरीली मौत से बचा सकें।
(~मूल लेख श्री Dr. Salman Arshad का है जिसे फेसबुक से लिया गया है।)
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