प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाई ।
राजा परजा जेहि रुचे, सीस देहि ले जाई ॥
भावार्थ: प्रेम खेत में नहीं उपजता, प्रेम बाज़ार में भी नहीं बिकता | चाहे कोई राजा हो या साधारण प्रजा, यदि प्यार पाना चाहते हैं तो वह आत्म बलिदान (शीश देना) से ही मिलेगा अर्थात त्याग और समर्पण के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता | प्रेम गहन-सघन भावना है, कोई खरीदी / बेचे जाने वाली वस्तु नहीं |
कबीर न तो कोई भगवान थे न कोई संत, न कोई धर्मोपदेशक, न उनके प्रवचनों की कोई प्रामाणिक किताब ही है, न ही उनके जन्म मरण की कोई ऐतिहासिक निश्चित तिथि,किन्तु ज़रूर कोई तो आम जुलाहा रहा होगा, शायद नाम कबीर न भी रहा हो !
उनका कहा गया लोग कहते गए, उनकी बातों को पालन करते हुए पंथ बन गए, और तो और फिल्मी गानों में भी "कबीरा मान जा.." हिट हो गया। और चूंकि लोग नाच भी लिए सो वो बादशा और हनी सिंह जैसे रैपर लोग के भी कॉम्पटीटर हो गए और प्रेरणा भी।
अपनी बुद्धि और सहजता से जो बातें कबीर ने कहीं वो ज्यादातर तार्किक और सार्थक थीं तथा आम जनमानस को छूने वाली थी, तभी सदियों बाद भी कबीर प्रासंगिक हैं।
दरअसल कबीर की बातें आम इंसान को उलझन से निकालकर सुलझाने वाली थी, आम जनमानस के जीवन को बेहतर बनाने वाली थीं और एक बेहतर समझदार इंसान बनाने वाली थीं।
रीति रिवाज़, परम्परा विरोधी, आडंबरों का विरोधी होने के कारण कट्टरपंथियों द्वारा उनके विचारों को पसंद नहीं किया जा सकता इसलिए वो कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं। आज ज़रूरत है कबीर के विचार को समझना और जितना हो सके पालन करना न कि आडम्बर रीत रिवाज़ में मूल विचार को ही भूल जाना.
कबीर सरल सहज तर्कों की बात करते हैं, किसी दूसरी दुनिया , स्वर्ग नरक , पुनर्जन्म जैसी काल्पनिक बातों से दूर ही रहते हैं।
एक तरफ वो गंगा और कठौती के पानी को एकसमान कहते हैं तो दूसरी तरफ वो ऊंचे मीनारों से ऊपरवाले को आवाज देने को भी अतार्किक मानते हैं और उन्हें अजीब लगता है। उनकी बहुत सी बातें आज भारत के जनमानस में घुली हुई है और संस्कृति तथा भाषा का हिस्सा हैं।
आज ज़रूरत है कबीर के विचार को समझना और जितना हो सके पालन करना, न कि आडम्बर रीत रिवाज़ में मूल विचार को ही भूल जाना..
No comments:
Post a Comment