Wednesday, March 11, 2020

kabhi kabhi yun bhi humne apne dil ko bahlaya hai, jin baton ko khud nahin samjhe auron ko samjhaya hai...

कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है,
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है...

हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी,
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है..

उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों,
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है..

कोई मिला तो हाथ मिलाया; कहीं गए तो बातें की,
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है...

-निदा फ़ाज़ली की लिखी और जगजीत सिंह की एक खूबसूरत ग़ज़ल Album: Visions (पर मैंने "रिश्तों में दरार आई" कैसेट में सुना है) , ये लाइनें आज एक मित्र ने भेजा और बहुत अच्छा लगा , काफी सुना है इस ग़ज़ल को कैस्सेट्स के ज़माने में, वो दौर अलग था, दुनिया भी अलग थी, 10-12 गाने होते थे एक cassette में और इतना सुनते थे की lyrics, tune और sequence भी याद हो जाता था...ये ग़ज़ल बहुत सरल और अर्थपूर्ण लगती थी और आज भी लगती है, और सोंचे तो हर कोई समझ और correlate कर सकता है....किसी को ग़ज़ल पसंद हो मगर ये नहीं सुन पाये हो तो ज़रूर सुनें आशा है आपको ज़रूर पसंद आयेगा...
(Copied from my Facebook wall 2017)

No comments:

Post a Comment