Saturday, January 11, 2020

uses of symbols in hindi : हिंदी में चिन्हों के अर्थ और प्रयोग :

हिन्दी भाषा अपने आप में एक वृहत और गहन भाषा है। लेखन एक तरह से मनुष्य की मानसिक अवस्था से जुड़ा हुआ होता है। किसी भी लेखन को निर्बाध नहीं लिखा जा सकता है।ऐसा इसलिए होता है कि हमारी मानसिक दशा हमेशा एक जैसी नहीं रहती है।

पाठ को सरल बनाने के लिए,भाव बोध के लिए, शब्दों और वाक्यों के परस्पर संबंध दर्शाने के लिए, पढ़ते समय एक वाक्य की समाप्ति के लिए हम जिन चिह्नों का प्रयोग करते हैं,उसे 'विराम चिह्न' कहते हैं।

अधिकांश विराम चिह्न जो आज हिन्दी में प्रयुक्त हैं, वो अंग्रेज़ी से लिए गए हैं। आइए देखते हैं कि कितने तरह के विराम चिह्न हैं।

  1. पूर्ण विराम (full stop) - ( । )
  2. अर्द्ध विराम( semi colon) -( ;)
  3. अल्प विराम (comma) -( , )
  4. प्रश्नवाचक चिह्न (sign of interrogation) - ( ? )
  5. विस्मय सूचक(sign of Exclamation) (! )
  6. उप विराम (colon) - ( : )
  7. अवतरण चिह्न - ( ' ')
  8. उद्धरण चिह्न) ( Inverted comma) - (" ")
  9. रेखिका या निर्देशक चिह्न (Dash) (-)
  10. विवरण चिह्न (colon + Dash) -(:- )
  11. त्रुटिपूर्ण चिह्न (sign of loftword) - (^ )
  12. कोष्ठक(Bracket) - ( ), [ ], { }
  13. समानता सूचक ( Equal) - ( =)
  14. दीर्घ उच्चारण चिह्न - (ऽ)
  15. लोप चिह्न - ( … )
  16. लाघव चिह्न - (०)
  17. पुनरूक्ति सूचक चिह्न - (,, ,,)
  18. समाप्ति सूचक - ( — ० —)

अब देखते हैं कि कैसे इन्हें प्रयोग में लाते हैं।

1) पूर्ण विराम (।) - किसी वाक्य के अंत में पूर्ण विराम चिह्न लगाने का मतलब होता है कि वह वाक्य समाप्त हो गया है। विस्मयकारी वाक्य( ) और प्रश्नवाचक वाक्य ( ) को छोड़कर सभी जगह पूर्ण विराम ( ) का प्रयोग होता है।

जैसे -

  • मैं घर जाता हूँ।
  • मैने पढ़ाई कर ली है।

2) अर्द्ध विराम (;) - जब किसी वाक्य को कहते हुए बीच में हल्का सा विराम लेना हो पर वाक्य को खत्म नहीं करना है तो वहाँ अर्द्ध चिह्न का प्रयोग किया जाता है। यहाँ अल्प विराम (,) से ज़्यादा और पूर्ण विराम (।) से कम रुकना हो तो उसे (;) अर्द्ध विराम कहते हैं। दो या तीन वाक्यांश के बीच में अर्ध विराम का प्रयोग किया जाता है।

जैसे -

  • आकाश में काले बादल छाए ; बादल गरजने लगे; तेज बारिश होने लगी और लोग भीगने लगे।
  • मैने जिसपर सबसे ज़्यादा भरोसा किया ;उसी ने मुझे धोखा दिया।
  • मीता पढ़ने में बहुत अच्छी है लेकिन वह किसी की बात नहीं सुनती है।

3) अल्प विराम (,) - जब किसी वाक्य को पूरा करने में पूर्ण विराम(।) से कम समय के लिए रुकना हो तो उसे अल्प विराम ( , ) कहते हैं। इसका प्रयोग एक से ज्यादा संज्ञाओं के बीच किया जाता है और वाक्य को पूरा करने के पहले दो संज्ञाओं के बीच और का प्रयोग किया जाता है।

जैसे -

  • सोहन, रजत, कमल और समीर सभी दोस्त घूमने के लिए गए।
  • रामू जरा मेरे पास तो आना।
  • हाँ अब मैं अपने घर जा रही हूँ।

अंको को लिखते समय भी इसका प्रयोग किया जाता है। 1 ,2,3, और 4 इस तरह से।

महीने और तारीख लिखने के लिए भी यह चिह्न प्रयोग में आता है।

जैसे -

  • 23 मई , 2019 को वोटिंग का परिणाम आ जाएगा।

4) प्रश्नवाचक चिह्न ( ?) - जिस वाक्य में किसी प्रश्न के पूछे जाने की अनुभूति हो तो वहाँ वाक्य के अंत में इस चिह्न ( ? ) का प्रयोग होता है।

जैसे -

  • तुम्हारा नाम क्या है ?
  • तुम कहाँ जा रहे हो ?
  • क्या तुम्हें मिठाई खाना पसंद है ?

5) विस्मय सूचक या आश्चर्य चिह्न ( ! ) - जब किसी वाक्य में आश्चर्य,घृणा, शोक,हर्ष आदि भावों का बोध कराने के लिए इस चिह्न ( ! ) का प्रयोग किया जाता है।

जैसे -

  • ओह यह तो तुम्हारे साथ बुरा हुआ।
  • वाह क्या सुहाना मौसम है।
  • अरे तुम कब आए।
  • हे भगवान यह तुम्हारी कैसी लीला है।
  • अच्छा ऐसा बोला तुमसे उस पाखंडी ने।
  • शाबाश मुझे तुमसे यही उम्मीद थी।

6) उप विराम या अपूर्ण विराम (:) -जब किसी शब्द को अलग दिखाना हो तो वहाँ उप विराम का प्रयोग किया जाता है।

जैसे -

  • विज्ञान वरदान या अभिशाप।
  • उदाहरण राम घर जाता है।

7 ) अवतरण चिह्न (' ') या किसी वाक्य में किसी खास शब्द पर जोर देने के लिए इस चिह्न का उपयोग किया जाता है।

अवतरण चिह्न (' ') का उदाहरण :

  • 'गोदान' मुंशी प्रेमचंद का सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है।
  • 'रामायण ' हिन्दुओं का धार्मिक ग्रंथ है।

8) उद्धरण चिह्न ( " ") किसी और के लिखे वाक्य को ज्यों का त्यों लिखने के लिए भी 'उद्धरण चिह्न' का उपयोग होता है।

जैसे -

  • हरिवंश राय जी ने कहा है " मन का हो तो अच्छा, मन का न हो तो और भी अच्छा।"

9 ) रेखिका या निर्देशक यासंयोजक चिह्न ( डैश) (-) इस चिह्न का प्रयोग किसी के द्वारा कही गयी बात को दर्शाने के लिए किया जाता है।

जैसे -

  • माँ ने कहा  आज तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है तो तुम स्कूल मत जाओ।
  • तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा  सुभाष चंद्र बोस।

किसी शब्द की पुनरावृत्ति होने पर भी बीच में संयोजक चिह्न का प्रयोग होता है।

जैसे :

  • कभी कभी, चलते - चलते।

युग्म शब्दों के साथ पर यह चिह्न प्रयोग में आता है।

जैसे

  • खेल में तो हार जीत लगी ही रहती है।
  • भाई -बहन साथ में खेल रहे हैं।
  • खाना - पीना हो जाए तो सो जाना।

तुलनात्मक वाक्य के पहले डैश का प्रयोग होता है।

  • झील - सी आँखें
  • सागर - सा गहरा

10) विवरण चिह्न (:-) विवरण चिन्ह वाक्यांश की जानकारी ,सूचना आदि को दर्शाने के लिए की जाती है।

जैसे -

  • निम्न लिखित नियमों का पालन करें :-
  • मेरे उत्तर के महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं :-

11) त्रुटिपूर्ण चिह्न (^) जब किसी वाक्य को लिखने में कोई शब्द छूट जाता है तो इस चिह्न का प्रयोग करके छूटे हुए शब्द को ऊपर लिख दिया जाता है।

जैसे -

  • रोहन कल ^ दिल्ली जाएगा।

12) कोष्ठक ( ), { }, [ ] कोष्ठक का प्रयोग किसी शब्द की अधिक जानकारी बताने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग वाक्यों के बीच में किया जाता है। कोष्ठक भी तीन प्रकार के होते हैं।

  • लघु कोष्ठक ( )
  • मध्य कोष्ठक { }
  • दीर्घ कोष्ठक [ ]

हिन्दी साहित्य लेखन में लघु कोष्ठक का ही इस्तेमाल किया जाता है। बाकी का प्रयोग गणित में किया जाता है।

जैसे -

  • दशहरे के अवसर पर दशानन (रावण) के पुतले का दहन किया जाता है।
  • डा. राजेन्द्र प्रसाद ( भारत के पहले राष्ट्रपति) का जन्म 3 दिसंबर 1884 को हुआ था।

13) समानता सूचक चिह्न ( =) किसी शब्द या गणित के अंको की समानता को दर्शाने के लिए समानता सूचक चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे -

  • अशिक्षित = अनपढ़
  • 4 और 4= 8

14) दीर्घ उच्चारण चिह्न (ऽ ) जब किसी वाक्य के उच्चारण में अन्य शब्दों की अपेक्षा अधिक समय लगता है तो वहाँ दीर्घ उच्चारण चिह्न का प्रयोग होता है।

का , की, कू के, कै, को, कौ में दीर्घ मात्रा और क, कि, कु के लिए छोटी या लघु मात्रा का प्रयोग किया जाता है।

ओऽम के उच्चारण में दीर्घ मात्रा चिह्न का प्रयोग होता है।

15 ) लोप चिह्न (…) जब किसी वाक्य में कुछ अंश छोड़कर लिखना हो तो उसमें लोप चिह्न का प्रयोग किया जाता है।

जैसे -

  • मैं टिकट ला देता हूँ…, पर मैं साथ नहीं चलूँगा।
  • मैंने खाना बना दिया है …, लेकिन अभी मैं नहीं खाऊँगी।

16 ) लाघव चिह्न ( ० ) किसी शब्द का संक्षिप्त रूप लिखने के लिए लाघव चिह्न का प्रयोग होता है।

जैसे -

  • डॉक्टर को- डा०
  • प्रोफेसर को - प्रो ०
  • उत्तर प्रदेश को - उ० प्र ०

17) पुनरूक्ति सूचक चिह्न (,, ,,) इसका उपयोग ऊपर लिखे हुए किसी वाक्य के अंश को दोबारा दोहराने के लिए किया जाता है ताकि एक ही चीज बार बार न लिखना पड़े।

जैसे -

  • राम के पास 100 रूपए हैं।
  • श्याम के पास ,, ,, ,,।
  • मोहन के पास ,, ,, ,, ।

इसका मतलब सबके पास 100 रूपए हैं।

18) समाप्ति सूचक चिह्न (—० —) समाप्ति सूचक चिह्न का उपयोग बड़े लम्बे लेख,कहानी,अध्याय अथवा पुस्तक के अंत में करते हैं, जो यह सूचित करता है कि कहानी समाप्त हो गयी है।

हमने हिन्दी भाषा को लिखने में जितने चिह्नों का प्रयोग होता है,उन सबका विस्तृत वर्णन किया है। जिससे यह पता चलता है कि हिन्दी लिखने के लिए किस जगह पर सही चिह्न का इस्तेमाल करके हिन्दी लेखन में शुद्धता लायी जा सकती है।

स्रोत -विराम चिह्न के प्रकार | Studyfry  और quota hindi

धन्यवाद!

Monday, January 6, 2020

ghazal ग़ज़ल गीत music संगीत jagjit singh जगजीत सिंह की एक ग़ज़ल जुदाई दुनिया और प्यार पे...

कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे,
मैं उतना याद आऊँगा मुझे जितना भुलाओगे!

कोई जब पूछ बैठेगा खामोशी का सबब तुमसे,
बहुत समझाना चाहोगे मगर समझा न पाओगे...

कभी दुनिया मुक्कमल बन के आएगी निगाहों में,
कभी मेरे कमी दुनिया की हर एक शय में पाओगे।

कहीं पर भी रहें हम तुम मोहब्बत फिर मोहब्बत है,
तुम्हें हम याद आयेंगे हमें तुम याद आओगे।

कभी खामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे, 
मैं उतना याद आऊँगा, मुझे जितना भुलाओगे....

Words & meaning : 
सबब = कारण, reason
मुक्कमल = पूर्ण, perfect
शय = वस्तु, चीज़ , Thing

✒नज़ीर बनारसी

Listen at : 
Gaana link : 
https://gaana.com/song/kabhi-khamosh-baithoge-2

Watch at : Youtube link : https://youtu.be/bg1aVF8xCsg

film review हिंदी फिल्म समीक्षा

" पिछले 3–4 सालों से ये सलमान मस्त चूतिया बना रा है हमको…पहले टाइगर जिंदा है, ट्यूब लाइट, भारत, रेस 3 और अब दबंग3…😢 "

मेरे दोस्तों के कहे गए ये शब्द ही दबंग 3 फ़िल्म का सबसे छोटा और ईमानदार विश्लेषण करते हैं।

अब दबंग3 का ईमानदार विश्लेषण, मेरे दृष्टिकोण से : दबंग देखी थी टीवी पर (थिएटर में नहीं), सलमान पसंद न होने पर भी फ़िल्म पसंद आई थी । 3 गाने दबंग दबंग हुड़ दबंग (बेहतरीन लिरिक्स और जोश जगाने वाला), तूने तो पल भर में चोरी किया रे जिया(धीमे धीमे चलने वाला रोमांटिक गीत) , तेरे मस्त मस्त दो नैन (सरल मनोरंजक फिल्मांकन और प्यार का एहसास कराने वाला गीत) पसंद हैं। एक कस्बाई बैकड्रॉप में सीधी सरल कहानी, अच्छी थी ।

दबंग2 देखने की हिम्मत न हुई । सलमान का स्टारडम ओवररेटेड है और केवल उसके नाम पे फ़िल्म जाने का कभी खयाल नहीं आया। बजरंगी भाईजान के रिव्यूज अच्छे थे सो टॉकीज में ही देख था और फ़िल्म भी अच्छी थी। कल ही खराब रिव्युज पढ़ने के बाद भी दबंग3 देखने की हिम्मत की…, अब क्या करें परिवार के साथ नए साल का जश्न जो मनाना था और घरवालों के फ़िल्म देखने का प्लान जो था। हिंदी फिल्मों को लेकर एक धारणा थी कि आज के दौर में बेकार कही जाने वाली फ्लॉप फ़िल्म भी 80s के जमाने की अच्छी कही जाने वाली हिट फिल्मो से अच्छी होती हैं, बस फिर क्या था , बन गया प्लान फ़िल्म का। तो फ़िल्म देखकर निराश हुई और बस अब वो धारणा बदलनी पड़ेगी की बकवास फिल्मे अब नहीं बनती है।😂😂😂

2.5/10 : ईमानदार विश्लेषण करें तो इसे 10 में से 2.5 अंक ही मिलने चाहिए :

कैसे???? भई ऐसे …👇👇👇👇

3/10 कहानी : वही घिसी पिटी बदला वाली , लार्जर देन लाइफ हीरो की मसालेदार किन्तु एवरेज से भी कम रोमांचक कहानी। आज दर्शक बाहुबली2 की तरह ही अच्छी सीक्वल की उम्मीद करता है किन्तु इस फ़िल्म की कहानी से निराशा ही होती है।

3/10 पटकथा : कहानी को बेहतर ढंग से कहने में असमर्थ स्क्रिप्ट। साधारण सी कहानी को भी एक अच्छी पटकथा शानदार बना देती है। ये बहुत मुश्किल और फिल्मी दुनिया का एक अनग्लैमरस किन्तु महत्वपूर्ण काम होता है , याद करिये अमिताभ शशि कपूर की दीवार और अमिताभ धर्मेंद्र की शोले , ऐसी कहानियां पहले भी कही गयी थीं पर इनकी शानदार पटकथा ने इन्हें आजतक की सबसे बेहतरीन फ़िल्म के साथ साथ लोकप्रिय और व्यावसायिक रूप से भी सफल बनाया।

2/10 एडिटिंग : कहानी और पटकथा की कमजोरी को बेहतर एडिटिंग छुपा लेती है जैसे कि साथिया, छिछोरे, माचिस, 3 इडियट्स, पीके, बाहुबली , ज्वेल थीफ, शोले आदि फिल्में कही गयी कहानी को रोमांचक टुकड़ों में प्रस्तुत करती हैं पर ऐसा कुछ भी इस दबंग3 में नहीं है।

2/10 संवाद : मैं आज भी गिरे हुए पैसे नहीं उठाता …जिनके खुद के घर शीशे के हों…ये बच्चों के खेलने की चीज ..पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ.. मेरे पास माँ है…! ...कितने आदमी थे!..ये हाथ हमका दे दे ठाकुर! …तारीख! तारीख पे तारीख…जब तक तुम मेरे साथ हो मुझे मारने वाला पैदा नहीं हुआ मामा ..! ' , 'औरत पर हाथ डालने वाले की उँगलियाँ नहीं काटते, काटते हैं तो गला! ..' थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब प्यार से डर लगता है…हम तुममें इतने छेद करेंगे कि…भैया जी स्माइल ! …ऐसा कोई भी जोरदार संवाद या फिल्मांकन नहीं है, कुछ एक हैं भी तो उसे ठीक से हाईलाइट नहीं किया गया है..

7/10 अभिनय : अब सलमान अरबाज सोनाक्षी से बहुत ज्यादा अच्छी एक्टिंग की उम्मीद भी कोई करता नहीं है, और फ़िल्म में कहीं ज्यादा एक्टिंग दिखाने का मौका भी नही दिया है, सो अच्छा ही किया है।

4/10 दृश्यांकन : ठीक ठाक है पर और बेहतरीन की संभावनाएं थी। टीवी छोड़ के दर्शक टॉकीज तक क्यों आये? हॉलीवुड की फिल्में इस पर बहुत मेहनत करती हैं और इसीलिए बिना ज्यादा तामझाम के मार्केटिंग के भारत मे हिट होती हैं और सराही जाती हैं।

7/10 गीत संगीत : एवरेज ही है। दबंग दबंग गीत में कुछ लाइन्स जोड़ी है , खास नहीं है। मुन्नी बदनाम को भी मुन्ना बदनाम के नाम से रिक्रिएट कर कचरा ही किया है। हाँ 1–2 गाने कुछ शांत से हैं और प्रेम का सौम्य एहसास कराएंगे (फ़िल्म के बाद सुन सकते हैं)। किन्तु ज़ालिमों ने गानों को फ़िल्म के बीच मे ऐसा घुसेड़ा है कि फ़िल्म की स्टोरी को कॉम्पलिमेंट न करके कहानी के फ्लो को खराब करते हैं और फ़िल्म को बोझिल बनाते हैं। कुल मिलाकर गीत फ़िल्म के साथ ठीक से नहीं गूंथ पाए हैं और एवरेज ही हैं।

1/10 X फैक्टर : दिल दिया गल्लां …ओओ जाने जानाँ…सेल्फ़ी ले ले रे… जग घुमेया …जैसा कोई कैची गाना नहीं है फ़िल्म में। हाँ फ़िल्म 'तेरे नाम' में भूमिका चावल की तरह ही सइ मांजरेकर एक ताजगी लाती हैं फ़िल्म में , कुछ एक्शन भी अच्छे हैं . स्वर्गीय विनोद खन्ना के डुप्लीकेट को तो अच्छे मेकअप से सलमान के पिता की भूमिका दे दी है पर एक भी यादगार सीन उस पिता को नहीं दे पाए सो मेकअप टीम की मेहनत खराब ही की है। अंततः फ़िल्म एक बिलो एवरेज फ़िल्म साबित होती है और कोई छाप छोड़ने में असफल ही कही जाएगी।

फ़िल्म निर्माता और व्यावसायी का दृष्टिकोण : किसी हिट फिल्म का सीक्वल या बड़े स्टार की फ़िल्म को ओपनिंग अच्छी मिल जाती है , मार्केटिंग खर्च कम हो जाता है, फ़िल्म के शुरुआती बॉक्स आफिस कलेक्शन और पेड रिव्युज भी अच्छे ही मिल जाते हैं सो निर्माता और वितरक ऐसी फिल्मों में पैसा लगाते हैं क्योंकि लाभ कमाना ज्यादा आसान होता है।

दर्शक का दृष्टिकोण : एक अच्छी फिल्म देखना हो तो अच्छी कहानी पटकथा निर्देशक की ही फ़िल्म देखना उचित रहता है। शायद इसीलिए महंगे बड़े स्टार्स से बेहतर मध्यम स्टार्स की फ़िल्म देखना आजकल बेहतर है। और इसीलिए शायद खान्स से बेहतर राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना आदि की फिल्में देखना एक बेहतर चुनाव माना जाता है। अब आप और मैं दर्शक की श्रेणी में आते हैं और फ़िल्म कितनी व्यावसायिक सफल है या असफल इससे हमारा कोई सरोकार न होकर , देखी गयी फ़िल्म हमें कितना मनोरंजक लगती है ये कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अब इतने से दिल न भरा हो तो ये भी पढ़ें हुज़ूर :

Lalit Sahu का जवाब - दबंग 3 मूवी कैसी हैं?

सवाल के अनुरूप यहां केवल एक स्वत्रंत, निरपेक्ष , ईमानदार दृष्टिकोण रखने की कोशिश की है और सहमति असहमति या किसी अन्य दृष्टिकोण से समीक्षा के लिए हर कोई स्वतंत्र है ।

विकल्प / ऑप्शन: जल्द ही टीवी पे भी आ ही जाएगी, घर पे आराम से बैठ के , सोफे पे लेट के, जैसा चाहें फ्री में देख लेना 😉😊। और अगर थिएटर में ही कोई फ़िल्म देखने की ही ठान ली है आपने , तो इन दिनों दबंग3 के साथ ही जुमानजी3 ( हिंदी में ) भी लगी हुई है, सपरिवार देखने लायक मूवी है सो अगर अकेले , दोस्तों या परिवार के साथ फ़िल्म देखने का प्लान हो तो दबंग3 के बदले ये देखिएगा , मैने भी दबंग3 का प्रायश्चित ऐसे ही किया है आप भी try करिये, दबंग3 से बहुत ही बेहतर विकल्प है।

और हां कुछ जगहों पर ford vs Ferrari , frozen2, ASN(Avane Srimana Narayana) Kannada with English Subtitles, मर्दानी2, 'गुड न्यूज', और 'पति पत्नी और वो' आदि समकालीन फिल्मे दबंग3 से कहीं बेहतर फिल्में हैं जो अभी थिएटर में देखीं जा सकती हैं।

अपना कीमती समय और ध्यान से पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! आपका कीमती फीडबैक(प्रतिक्रिया) देंगे तो और भी ज्यादा खुशी होगी। शुक्रिया!🙏

Friday, January 3, 2020

उलझन : dilemma : uljhan : यक्ष प्रश्न : yaksh prashn

उलझन : 

करोड़ों चेहरे और उनके पीछे करोड़ों चेहरे,

ये रास्ते हैं की भीड़ के छत्ते, 
जमीन जिस्मों से ढंक गयी है,
कदम तो क्या तिल भी अब धरने की जगह नहीं है,

ये देखता हूँ तो सोंचता हूँ,
अब जहां हूँ, वहीँ सिमट के खड़ा रहूं मैं, 
मगर करूं क्या की जानता हूँ , 
कि रुक गया तो जो भीड़ पीछे से आ रही है,
वो मुझको पैरों तले कुचल देगी;  पीस देगी; तो अब जो चलता हूँ मैं,
तो खुद मेरे अपने पैरों में आ रहा है ; किसी का सीना ; किसी का बाजू ; किसी का चेहरा...

चलूं तो औरों पे ज़ुल्म ढाऊं;
रुकूँ तो औरों के ज़ुल्म झेलूँ ।

जमीर तुझको तो नाज़ है अपनी  मुंसिफ़ी पर, 
जरा सुनूँ तो कि आज क्या तेरा फैसला है...

..तरकश/ज़ावेद अख़्तर

Wednesday, January 1, 2020

happy new year नए साल की शुभकामनाएं

खत्म होता साल , नए वर्ष की शुरुआत , मेसेजेस के ढेर में एक और मैसेज और एक विचार: 

...गौर से सोंचियेगा, तो लगेगा कि हम सब एक योद्धा हैं। 
आप, मैं और हमारे आस पास का हर एक व्यक्ति!

हम सबका ऐसा अलग, अलहदा,  unique  व्यक्तित्व है, जिसे कोई नहीं समझता और सबसे बड़ी बात, हम खुद भी नहीं समझते। 
अक्सर लड़ते रहते हैं हर दिन, पूरी दुनिया से, वो भी अकेले। 

हम सब लड़ते रहते हैं कभी अपने अस्तित्व और हक़ के लिए, कभी एक बेहतर कल के लिए, तो कभी बस दो पल के सुकून के लिए। 
इन सब से सामना न भी हो, तो खुद से ही लड़ते रहते हैं! शायद लड़ना भी एक इंसानी प्रवृत्ति है, एक basic instinct है।

बहुत लंबे समय से चल रहा है ये संघर्ष। 
कभी थक के बैठ जाते हैं, कभी दर्द से कराह उठते हैं, तो कभी ये पीड़ा इतनी असहनीय हो जाती है कि हथियार डाल देना ही आखिरी विकल्प दिखता है।

*"मैं बच गया क्योंकि मेरे अंदर की आग,*
*मेरे चारों ओर की आग से कहीं ज्यादा उज्ज्वल थी।"*

फिर भी हम सब, रोते-बिलखते, खून से लथपथ और सीने में एक फौलाद लिए, डटे हुए हैं। 
किसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए, ...हम सब योद्धा हर रोज़ ये लड़ाई लड़े जा रहे हैं।
इस लड़ाई और संघर्ष में ये याद रखना भी महत्वपूर्ण है कि :

*ज़मीन और मुक़द्दर की एक ही फितरत है ,*
*जो भी बोया है , वो निकलना तय है . .*

आप, मैं, और हम सब, एक योद्धा हैं, जो इतनी कठिनाईयों के बाद भी डटे हुए है।

जब समय बह रहा है और दिन महीने साल गुज़रते जा रहे हैं , और फिर लड़ना भी तय ही है तो थोड़ा हंसते मुस्कुराते स्टाइल में लड़ा जाये, और  “जंग जारी रहे" ! 
आपकी लड़ाई को salute , सलाम , नमन ! 

वैसे हर शुरआत का एक अंत  सुनिश्चित है तो, शुरआत से अंत के बीच का *सफ़र* ज्यादा महत्वपूर्ण है। 

 *कौन कहता है वक्त मरता नहीं,*
*हमने सालों को ख़त्म होते देखा है दिसम्बर में!*

Calendars और साल बदलना तो एक रीत है... सदियों पुरानी , न जाने कितने आये और न जाने कितने गए, पर हम और दुनिया कितनी बदली ये ज्यादा महत्वपूर्ण है ..गुज़रे साल के साथ बहुत कुछ गुज़र गया, आगे आने वाला समय बेहतरीन हो और एक खूबसूरत याद बने ऐसी प्रार्थना और  ऐसी मंगल शुभकामनाएं! 💐

Lets move towards A Better World....wishing you and your beloved ones A Happy and prosperous New Year !💐

TheBetterWorldindia@outlook.com🙏

Wednesday, December 25, 2019

25 दिसंबर खास क्यों ?

🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾

हमारा देश विभिन्न धर्मों और  संस्कृतियों का संगमस्थल है, विविधता में एकता का देश: भारत।

 और आज का दिन तो विशेष  दिन है क्योंकि आज 25 दिसम्बर को ईसाई धर्म का बड़ा दिन यानि कि क्रिसमस है तो,  हिन्दू धर्म में तुलसी पूजन दिवस/सिख धर्म में बलिदान दिवस/ महाराजा बिजली पासी की जयंती एवं महामना मदनमोहन मालवीय जी एवं अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्मदिवस है।  
 योगदान और बलिदानियों को नमन एवं आपको शुभकामनाएं।

Our country is a confluence of different religions & cultures, a country of Unity in diversity.

 Today is really a big day as 25 December is the merry Christmas of Christianity, also Tulsi Pujan Day in Hinduism / Sacrifice Day in Sikhism / Birth Anniversary of Maharaja Bijli Pasi and the birthday of Mahamana Madan Mohan Malaviya ji and Shri Atal bihari Vajpayee ji ..wishes, congratulations, remembrance on this special day.

🤝🌹🙏🇮🇳💐🌈

Tuesday, December 24, 2019

Nostalgia, doordarshan, 90s, childhood : यादें बचपन 90 का दशक और दूरदर्शन


Doordarshan , 90s , बचपन: 

सालों हो गए कुछ लिखे हुए, अब हिंदी कीबोर्ड और इंटरनेट सुलभ और सस्ता होने से कंटेंट भी बढ़े हैं और यूज़र्स भी अब 2016 की दुनिया नहीं रही...
आज़कल हिंदी कोरा पर एक महीने से लिखना पढ़ना चल रहा है । 
अचानक से वहां पर एक सवाल मिला कि:

 दूरदर्शन का पहला सबसे लोकप्रिय धारवाहिक कौन सा था?

जवाब लिखते सोंचते एक अलग ही दुनिया मे पहुंच गया था सोंचा कि यहाँ भी शेयर करता हूँ.. शायद कोई भूले भटके यहां तक आये और पढ़ के उसे कुछ खुशी मिले....

अब तो बहुत सारे चैनलों की भीड़ में हम सबका नाता दूरदर्शन से कम हो गया है। और शायद कुछ ये भी सोंचे कि भई ये दूरदर्शन क्या बला है? हमें तो पता ही नहीं…धारावाहिक भी भला आते हैं क्या डीडी1 में ? कोई देखता भी क्या डीडी1 भला? पर हम तो भई हैं ओल्ड स्कूल वाले , 90s वाले, दूरदर्शन वाले, तो फिर चलिए सोंचते हैं….
सही मायनों में कहें तो दूरदर्शन का सुनहरा दौर गुज़र गया है.. और समय के साथ इसकी लोकप्रियता गुज़रे ज़माने की बात हो गयी है…सवाल का जवाब तलाशने के लिए भी गुज़रे जमाने मे जाने की ज़रूरत पड़ेगी…चलिए तो चलते है तलाश में…आखिर सभी को कुछ तलाश है….
ये सिग्नेचर ट्यून से करोड़ो की यादें जुड़ी हुई हैं, शायद बहुत से लोग अपनी अपनी यादों में लौट जाएं।
अब जब किसी के पास टीवी होगा तब ही न वो व्यक्ति दूरदर्शन या फिर कुछ और देख पायेगा। लेकिन भई 30–35 सालों पहले दूरदर्शन के जमाने मे तो अधिकतर घरों में टी वी भी नहीं हुआ करती थी…हां रेडियो ज़रूर हुआ करता था किंतु टी वी तो भई अमीर घरों की शोभा हुआ करती थी। तब कुछ धारावाहिक ऐसे आये जिन्हें देखने के लिए घरों में टीवी खरीदा जाने लगा, रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण को देखने के लिए ही इस देश के कई घरों में उनका पहला टीवी सेट खरीदा गया है। रंगीन टीवी और कार 1980 और 1990 के दशक तक अमीरी और वैभव की निशानी थी इस देश में। खुले व्यापार की नीति 1996 के आस पास आई और टीवी की दुनिया और हमारा देश तेजी से बदला…. जहां 90s तक के भारत के घरों में डायलर फोन भी नहीं हुआ करते थे वहीं आज हर घर के हर सदस्य की जेब मे स्मार्ट फोन और पर्सनल , रंगीन, मनचाहे प्रोग्राम दिखाने वाला टीवी है। पर पहले गिनती के घरों में ही ऐसे श्वेत श्याम यानी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी हुआ करते थे ….
आज किसी धारावाहिक की लोकप्रियता को नापने का एक स्पष्ठ पैमाना है TRP (टारगेट रेटिंग पॉइंट[1]https://en.m.wikipedia.org/wiki/Target_rating_point ) लेकिन दूरदर्शन के सुनहरे दौर में जब इस विशाल देश मे केवल एक ही चैनल उपलब्ध था उस समय पूरा देश , धर्म और नफरत की छुद्रता को त्यागकर रामायण और महाभारत देखता था .

इन धारावाहिकों ने वो कर दिया जो संविधान, धर्म और नेता लोग नहीं कर पाए , वो ये की इसने अमीरी गरीबी धर्म जाति आदि सारे वर्गीकरण और बंधनों को तोड़ दिया था। लगभग पूरे देश में लगभग हर कोई , क्या अमीर क्या गरीब सभी एक दूसरे का अपने घरों में दिल से स्वागत करते थे और सभी एक साथ बैठ कर रामायण और महाभारत देखते थे।[2]
1984 से 1987 के सालों में रामायण जब हर रविवार सुबह 9.30 बजे दूरदर्शन पे प्रसारित होता था तब सभी लोग अपने सारे काम धंधे निपटाकर या छोड़कर टीवी के आगे बैठ जाते थे तब गाँव कस्बों और शहरों के बाज़ारों में अघोषित कर्फ्यू जैसा माहौल हो जाता था।
कुछ सालों पहले ही रामायण को दुनिया का सबसे अधिक देखा (लगभग 200 मिलियन व्यूज[3] ) जाने वाला माइथेलॉजिकल धारावाहिक घोषित किया गया है[4]
तब उस 1980 और 1990s के दौर में हम भी प्राइमरी स्कूल के बच्चे हुआ करते थे और ज़िन्दगी बस स्कूल खेलकूद और दोस्तों में ही थी। तब शनिवार और रविवार का विशेष इंतज़ार होता था क्योंकि संडे को लगभग सभी बच्चे अंग्रेजी धारवाहिक स्पाइडरमैन और ही मैन[5] देखते थे , वैसे धारावाहिक में पात्र क्या कहते थे कुछ खास समझ तो नहीं आता था, पर देखने मे क्या मज़ा आता था आज किसी को समझा पाना मुश्किल है।
रात 8.40 को दूरदर्शन पर आता था समाचार , और लगभग वही समय सभी परिवारो के खाना खाने का समय होता था क्योंकि फिर 9 बजे से टीवी धारावाहिक आते थे -जैसे कि गुल गुलशन गुलफाम, इंतेज़ार, तलाश, काला जल, तमस, नीम का पेड़, नुक्कड़, फटीचर आदि सभी बहुत लोकप्रिय रहे हैं।
ये जो रविवार है न ये संडे बहुत खास होता था उस दौर के हम बच्चों के लिए क्योंकि डिज्नी के कार्टून्स आते थे डक टेल्स

टेल्सपिन

और आता था मोगली वाला द जंगल बुक जिसका टाइटल ट्रैक गुलज़ार का लिखा बालगीत उस दौर के हर बच्चे को याद होगा और वो बालगीत में एक मील का पत्थर है लकड़ी की काठी काठी पे घोड़ा ..वाले गीत की तरह.. शायद आपने भी सुना होगा तो धुन भी गूंजेगी कानों में इन शब्दों को पढ़ने से ….
जंगल जंगल बात चली है पता चला है,
चड्डी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है…

स्पेस सिटी सिग्मा, गायब आया , चंद्रकांता, शक्तिमान , मालदीव की कहानी स्टोन बॉय , जी साहब आदि का उल्लेख करूं तो शायद किसी को याद ही नही आएगा…पर सभी बेहद लोकप्रिय थे।
वैसे लोकप्रियता की बजाय उल्लेखनीय और प्रभावी हिंदी धारावाहिकों की बात करें तो भारत एक खोज [6] , विक्रम वेताल, मालगुडी डेज , चाणक्य, सुरभि, बातों बातों में, उल्टा पुल्टा , मुंगेरीलाल के हसीन सपने, और फ्लॉप शो , भारतीय शेरलॉक होम्स यानी ब्योमकेश बक्शी करमचंद औरतहकीकात , महिला सशक्तिकरण के बेहतरीन चित्र प्रस्तुत करने वाले धारावाहिक रजनी , उड़ान, शांति और प्राइवेट चनलों को टक्कर देते विदेशी सोप ओपेरा की तर्ज़ वालेस्वाभिमान आदि जैसे कई धारावाहिक आते हैं।[7]
वैसे 1984 में शुरू हुए हिंदी के पहले डेली सोप ओपेरा हम लोग को या भारत पाकिस्तान बंटवारे की पृष्ठभूमि पर बने धारावाहिक बुनियाद भी पहला लोकप्रिय धारवाहिक कहा जा सकता है किंतु जो आंदोलनकारी मास अपील रामायण और महाभारत को लेकर थी वो इनमें नहीं थी । शायद उन सालों तक टीवी की पहुंच और पेनेट्रेशन आम जनमानस तक न होकर उच्च मध्यमवर्ग वाले इलीट क्लास तक ही थी।
रामानंद सागर ने अपनी बीमारी के दिनों में रामायण , आध्यात्म और भक्ति से नई ऊर्जा प्राप्त की थी। वो ऊर्जा सभी को देने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे फलतः देश के 16 से भी ज्यादा भाषाओं के रामायणों का अध्य्यन कर रामायण धारावाहिक का निर्माण किया था । उन दिनों न तो कोई VFX जैसी चीज ही थी और न ही टीवी सीरिअल्स के निर्माण में कंप्यूटर का ज्यादा दखल , सो तीर टकराने जैसे दृश्य आज हास्यास्पद प्रतीत होते हैं पर उस दौर में वो कौतूहल का विषय होते थे। और रामायण को इतने विस्तृत ढंग से, जन जन तक उनकी सरल अभिव्यक्ति ऑडियो विसूअल रूप में पहुंचाने में इस धारावाहिक का बहुत बड़ा योगदान माना जाना चाहिए। लोकप्रियता ऐसी थी कि कलाकारों की लोग पूजा करते थे, कुछ तो चुनावों में खड़े होकर संसद तक भी पहुंच गए।
संगीत के कार्यक्रमों में चित्रहार भी रात 8 बजे जब आता था लोग अपने अपने घरों की तरफ भागते दिखते थे। फिर 1989 में शुरू हुआ रंगोली भी आजतक लोकप्रिय और पसंद किया जाने वाला कार्यक्रम हैं। अब संगीत की बात हो और ग़ज़लों का जिक्र न हो ऐसा संभव नहीं, तो दूरदर्शन में ही गुलज़ार और जगजीत सिंह जी के बनाये मिर्ज़ा ग़ालिब और कहकशां टीवी धारावाहिक बन कर आये जो कि एक नायाब मोती है ग़ज़ल प्रेमियों के लिए।
1987 में रामायण के समाप्त होने के बाद 1988 में बी आर चोपड़ा की महाभारत शुरू हुई जिसने रामायण की लोकप्रियता को भी पार कर दिया था, और उसे रामायण से भी ज्यादा व्यूवरशिप मिली हुई है । बाद में उत्तर रामायण भी आयी किन्तु देर रात्रि के स्लॉट में उसे वो लोकप्रियता नहीं मिल पाई जिसकी उम्मीद थी।
पर हां हम आपसे एक बात तो कहना भूल ही गए , घबराइए नहीं ,हमें कुछ नहीं चाहिए, हम बस इतना चाहते हैं कि आप बारातियों का स्वागत पान पराग से करें! …पान पराग, पान मसाला, पान पराग.…" ..कहने का मतलब है कि अगर उस दौर का जिक्र हो और ऐसे ही कुछ लोकप्रिय टीवी कॉमर्शियल का जिक्र न हो तो बात अधूरी सी लगेगी… क्योंकि उस दौर के टीवी कमर्शियल तक लोगों के ज़ेहन में बैठे हुए हैं उनपे चर्चा न करना भी एक अधूरेपन का एहसास कराएगा…वाशिंग पाउडर निरमा हो यालक्ष्मण सिल्वेनिया का स्लोगन "पूरे घर को बदल डालूंगा"या बजाज बल्ब का "जब मैं बिल्कुल छोटा था बड़ी शरारत करता था मेरी चोरी पकड़ी जाती…जब रोशन होता बजाज " और सिंकारा, रसना के टीवी कमर्शियल भी ध्यान से देखे जाते थे..और अगर कभी लोकप्रिय टी वी कमर्शियल्स की बात निकलेगी तो लोकप्रियता के पैमाने पर इन ऐडवेरताइजमेंट्स का अलग ही स्थान रहेगा…भले ही इनकी लोकप्रियता की बड़ी वजह आज के जैसे चैनल बदलने के ऑप्शन का उस समय उपलब्ध न होना भी है….अब क्या करें इनका इलाज गोलियां नही …(90s का हसीन दौर था वो…..और था कभी न लौट के आने वाला निश्छल प्यारा बचपन! सब गुज़र गया …😢…
जैसे कि :
तुम गए, सब गया ,
मैं अपनी ही मिट्टी तले , दब गया !
(सरल से सवाल का जवाब ढूंढ़ते हुए कब 90s और बचपन की यादों में डुबकी लगा के इतना सारा लिखा गया ध्यान नहीं रहा, जवाब की तलाश में काफी व्यक्तिगत भी हो गया हूँ , पढ़ने वालों से अनुरोध है की कृपया इस लंबे जवाब के बारे में मुझे अपनी पसंद नापसंद और प्रतिक्रिया कृपया अवश्य बताएं, बहुत खुशी होगी।)
धन्यवाद , शुक्रिया , करम, मेहरबानी, Thank you!💐