Monday, January 6, 2020

film review हिंदी फिल्म समीक्षा

" पिछले 3–4 सालों से ये सलमान मस्त चूतिया बना रा है हमको…पहले टाइगर जिंदा है, ट्यूब लाइट, भारत, रेस 3 और अब दबंग3…😢 "

मेरे दोस्तों के कहे गए ये शब्द ही दबंग 3 फ़िल्म का सबसे छोटा और ईमानदार विश्लेषण करते हैं।

अब दबंग3 का ईमानदार विश्लेषण, मेरे दृष्टिकोण से : दबंग देखी थी टीवी पर (थिएटर में नहीं), सलमान पसंद न होने पर भी फ़िल्म पसंद आई थी । 3 गाने दबंग दबंग हुड़ दबंग (बेहतरीन लिरिक्स और जोश जगाने वाला), तूने तो पल भर में चोरी किया रे जिया(धीमे धीमे चलने वाला रोमांटिक गीत) , तेरे मस्त मस्त दो नैन (सरल मनोरंजक फिल्मांकन और प्यार का एहसास कराने वाला गीत) पसंद हैं। एक कस्बाई बैकड्रॉप में सीधी सरल कहानी, अच्छी थी ।

दबंग2 देखने की हिम्मत न हुई । सलमान का स्टारडम ओवररेटेड है और केवल उसके नाम पे फ़िल्म जाने का कभी खयाल नहीं आया। बजरंगी भाईजान के रिव्यूज अच्छे थे सो टॉकीज में ही देख था और फ़िल्म भी अच्छी थी। कल ही खराब रिव्युज पढ़ने के बाद भी दबंग3 देखने की हिम्मत की…, अब क्या करें परिवार के साथ नए साल का जश्न जो मनाना था और घरवालों के फ़िल्म देखने का प्लान जो था। हिंदी फिल्मों को लेकर एक धारणा थी कि आज के दौर में बेकार कही जाने वाली फ्लॉप फ़िल्म भी 80s के जमाने की अच्छी कही जाने वाली हिट फिल्मो से अच्छी होती हैं, बस फिर क्या था , बन गया प्लान फ़िल्म का। तो फ़िल्म देखकर निराश हुई और बस अब वो धारणा बदलनी पड़ेगी की बकवास फिल्मे अब नहीं बनती है।😂😂😂

2.5/10 : ईमानदार विश्लेषण करें तो इसे 10 में से 2.5 अंक ही मिलने चाहिए :

कैसे???? भई ऐसे …👇👇👇👇

3/10 कहानी : वही घिसी पिटी बदला वाली , लार्जर देन लाइफ हीरो की मसालेदार किन्तु एवरेज से भी कम रोमांचक कहानी। आज दर्शक बाहुबली2 की तरह ही अच्छी सीक्वल की उम्मीद करता है किन्तु इस फ़िल्म की कहानी से निराशा ही होती है।

3/10 पटकथा : कहानी को बेहतर ढंग से कहने में असमर्थ स्क्रिप्ट। साधारण सी कहानी को भी एक अच्छी पटकथा शानदार बना देती है। ये बहुत मुश्किल और फिल्मी दुनिया का एक अनग्लैमरस किन्तु महत्वपूर्ण काम होता है , याद करिये अमिताभ शशि कपूर की दीवार और अमिताभ धर्मेंद्र की शोले , ऐसी कहानियां पहले भी कही गयी थीं पर इनकी शानदार पटकथा ने इन्हें आजतक की सबसे बेहतरीन फ़िल्म के साथ साथ लोकप्रिय और व्यावसायिक रूप से भी सफल बनाया।

2/10 एडिटिंग : कहानी और पटकथा की कमजोरी को बेहतर एडिटिंग छुपा लेती है जैसे कि साथिया, छिछोरे, माचिस, 3 इडियट्स, पीके, बाहुबली , ज्वेल थीफ, शोले आदि फिल्में कही गयी कहानी को रोमांचक टुकड़ों में प्रस्तुत करती हैं पर ऐसा कुछ भी इस दबंग3 में नहीं है।

2/10 संवाद : मैं आज भी गिरे हुए पैसे नहीं उठाता …जिनके खुद के घर शीशे के हों…ये बच्चों के खेलने की चीज ..पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ.. मेरे पास माँ है…! ...कितने आदमी थे!..ये हाथ हमका दे दे ठाकुर! …तारीख! तारीख पे तारीख…जब तक तुम मेरे साथ हो मुझे मारने वाला पैदा नहीं हुआ मामा ..! ' , 'औरत पर हाथ डालने वाले की उँगलियाँ नहीं काटते, काटते हैं तो गला! ..' थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब प्यार से डर लगता है…हम तुममें इतने छेद करेंगे कि…भैया जी स्माइल ! …ऐसा कोई भी जोरदार संवाद या फिल्मांकन नहीं है, कुछ एक हैं भी तो उसे ठीक से हाईलाइट नहीं किया गया है..

7/10 अभिनय : अब सलमान अरबाज सोनाक्षी से बहुत ज्यादा अच्छी एक्टिंग की उम्मीद भी कोई करता नहीं है, और फ़िल्म में कहीं ज्यादा एक्टिंग दिखाने का मौका भी नही दिया है, सो अच्छा ही किया है।

4/10 दृश्यांकन : ठीक ठाक है पर और बेहतरीन की संभावनाएं थी। टीवी छोड़ के दर्शक टॉकीज तक क्यों आये? हॉलीवुड की फिल्में इस पर बहुत मेहनत करती हैं और इसीलिए बिना ज्यादा तामझाम के मार्केटिंग के भारत मे हिट होती हैं और सराही जाती हैं।

7/10 गीत संगीत : एवरेज ही है। दबंग दबंग गीत में कुछ लाइन्स जोड़ी है , खास नहीं है। मुन्नी बदनाम को भी मुन्ना बदनाम के नाम से रिक्रिएट कर कचरा ही किया है। हाँ 1–2 गाने कुछ शांत से हैं और प्रेम का सौम्य एहसास कराएंगे (फ़िल्म के बाद सुन सकते हैं)। किन्तु ज़ालिमों ने गानों को फ़िल्म के बीच मे ऐसा घुसेड़ा है कि फ़िल्म की स्टोरी को कॉम्पलिमेंट न करके कहानी के फ्लो को खराब करते हैं और फ़िल्म को बोझिल बनाते हैं। कुल मिलाकर गीत फ़िल्म के साथ ठीक से नहीं गूंथ पाए हैं और एवरेज ही हैं।

1/10 X फैक्टर : दिल दिया गल्लां …ओओ जाने जानाँ…सेल्फ़ी ले ले रे… जग घुमेया …जैसा कोई कैची गाना नहीं है फ़िल्म में। हाँ फ़िल्म 'तेरे नाम' में भूमिका चावल की तरह ही सइ मांजरेकर एक ताजगी लाती हैं फ़िल्म में , कुछ एक्शन भी अच्छे हैं . स्वर्गीय विनोद खन्ना के डुप्लीकेट को तो अच्छे मेकअप से सलमान के पिता की भूमिका दे दी है पर एक भी यादगार सीन उस पिता को नहीं दे पाए सो मेकअप टीम की मेहनत खराब ही की है। अंततः फ़िल्म एक बिलो एवरेज फ़िल्म साबित होती है और कोई छाप छोड़ने में असफल ही कही जाएगी।

फ़िल्म निर्माता और व्यावसायी का दृष्टिकोण : किसी हिट फिल्म का सीक्वल या बड़े स्टार की फ़िल्म को ओपनिंग अच्छी मिल जाती है , मार्केटिंग खर्च कम हो जाता है, फ़िल्म के शुरुआती बॉक्स आफिस कलेक्शन और पेड रिव्युज भी अच्छे ही मिल जाते हैं सो निर्माता और वितरक ऐसी फिल्मों में पैसा लगाते हैं क्योंकि लाभ कमाना ज्यादा आसान होता है।

दर्शक का दृष्टिकोण : एक अच्छी फिल्म देखना हो तो अच्छी कहानी पटकथा निर्देशक की ही फ़िल्म देखना उचित रहता है। शायद इसीलिए महंगे बड़े स्टार्स से बेहतर मध्यम स्टार्स की फ़िल्म देखना आजकल बेहतर है। और इसीलिए शायद खान्स से बेहतर राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना आदि की फिल्में देखना एक बेहतर चुनाव माना जाता है। अब आप और मैं दर्शक की श्रेणी में आते हैं और फ़िल्म कितनी व्यावसायिक सफल है या असफल इससे हमारा कोई सरोकार न होकर , देखी गयी फ़िल्म हमें कितना मनोरंजक लगती है ये कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अब इतने से दिल न भरा हो तो ये भी पढ़ें हुज़ूर :

Lalit Sahu का जवाब - दबंग 3 मूवी कैसी हैं?

सवाल के अनुरूप यहां केवल एक स्वत्रंत, निरपेक्ष , ईमानदार दृष्टिकोण रखने की कोशिश की है और सहमति असहमति या किसी अन्य दृष्टिकोण से समीक्षा के लिए हर कोई स्वतंत्र है ।

विकल्प / ऑप्शन: जल्द ही टीवी पे भी आ ही जाएगी, घर पे आराम से बैठ के , सोफे पे लेट के, जैसा चाहें फ्री में देख लेना 😉😊। और अगर थिएटर में ही कोई फ़िल्म देखने की ही ठान ली है आपने , तो इन दिनों दबंग3 के साथ ही जुमानजी3 ( हिंदी में ) भी लगी हुई है, सपरिवार देखने लायक मूवी है सो अगर अकेले , दोस्तों या परिवार के साथ फ़िल्म देखने का प्लान हो तो दबंग3 के बदले ये देखिएगा , मैने भी दबंग3 का प्रायश्चित ऐसे ही किया है आप भी try करिये, दबंग3 से बहुत ही बेहतर विकल्प है।

और हां कुछ जगहों पर ford vs Ferrari , frozen2, ASN(Avane Srimana Narayana) Kannada with English Subtitles, मर्दानी2, 'गुड न्यूज', और 'पति पत्नी और वो' आदि समकालीन फिल्मे दबंग3 से कहीं बेहतर फिल्में हैं जो अभी थिएटर में देखीं जा सकती हैं।

अपना कीमती समय और ध्यान से पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! आपका कीमती फीडबैक(प्रतिक्रिया) देंगे तो और भी ज्यादा खुशी होगी। शुक्रिया!🙏

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