Friday, January 3, 2020

उलझन : dilemma : uljhan : यक्ष प्रश्न : yaksh prashn

उलझन : 

करोड़ों चेहरे और उनके पीछे करोड़ों चेहरे,

ये रास्ते हैं की भीड़ के छत्ते, 
जमीन जिस्मों से ढंक गयी है,
कदम तो क्या तिल भी अब धरने की जगह नहीं है,

ये देखता हूँ तो सोंचता हूँ,
अब जहां हूँ, वहीँ सिमट के खड़ा रहूं मैं, 
मगर करूं क्या की जानता हूँ , 
कि रुक गया तो जो भीड़ पीछे से आ रही है,
वो मुझको पैरों तले कुचल देगी;  पीस देगी; तो अब जो चलता हूँ मैं,
तो खुद मेरे अपने पैरों में आ रहा है ; किसी का सीना ; किसी का बाजू ; किसी का चेहरा...

चलूं तो औरों पे ज़ुल्म ढाऊं;
रुकूँ तो औरों के ज़ुल्म झेलूँ ।

जमीर तुझको तो नाज़ है अपनी  मुंसिफ़ी पर, 
जरा सुनूँ तो कि आज क्या तेरा फैसला है...

..तरकश/ज़ावेद अख़्तर

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