Saturday, March 6, 2021

मोह मोह के धागे..Moh Moh Ke dhaage...The threads of endearment are entangled in your fingers..(.गाने और एहसास)

" मोह मोह के धागे "  एक खूबसूरत धीमा और कर्णप्रिय हिंदी फिल्मी गीत है। आजकल शोर  भरे गानों के बीच ये धीमा से रोमान्टिक प्रेम गीत दिल को खुद कर देने वाला है।

गीतकार वरुण ग्रोवर द्वारा इसके बोल बहुत ही संवेदनशीलता से लिखे हुए हैं और धीमी धुन तथा हल्का म्यूजिक इसे कानों से दिल तक पहुंचाता है। साल 2015 के सबसे महत्वपूर्ण और याद रखे जाने वाले हिंदी गानों में इसे याद रख जाएगा। अन्नू मलिक यूँ तो बड़बोले लगते हैं किंतु ऐसे बेहतरीन गानों से सबको चौंकाते रहते हैं । गायक पापोन और मोनाली ठाकुर ने इसे बहुत ही खूबसूरती से गाया है तथा शब्दों को भावनाओं को खूबसूरत अभिव्यक्ति दिया है। 
अगर  हिंदी समझ आती है और ये गाना नहीं सुना है तो ज़रूर सुनियेगा, आशा है पसंद आएगा। गाने के बोल पढ़ेंगे और समझेंगे तो उसके बाद सुनने का ज्यादा मज़ा आएगा और गीत निश्चिततः आपके जेहन में बस जाएगा।  फ़िल्म भी अच्छी है और देखी जा सकती है। 
Lyrics : 
ये मोह मोह के धागे तेरी उँगलियों से जा उलझे,
कोई टोह टोह ना लागे, किस तरह गिरह ये सुलझे,
है रोम रोम एक तारा, जो बादलों में से गुज़रे...

तु होगा ज़रा पागल तूने मुझको है चुना,
कैसे तूने अनकहा, तूने अनकहा सब सुना!
तु दिन सा है, मैं रात,
आ ना दोनों,  मिल जाएं शामों की तरह...
ये मोह मोह के धागे...

के ऐसा बेपरवाह मन पहले तो ना था,
चिट्ठियों को जैसे मिल गया, जैसे इक नया सा पता!
खाली राहें, हम आँख मूंदें जाएँ,
पहुंचे कहीं तो बेवजह,
ये मोह मोह के धागे...
के तेरी झूठी बातें मैं सारी मान लूँ,
आँखों से तेरे सच सभी, सब कुछ अभी    जान लूँ!
तेज है धारा, बहते से हम आवारा,
आ थम के साँसे ले यहाँ...
ये मोह मोह के धागे...

Moh moh ke dhage....
Album/Movie: Dum Laga Ke Haisha (2015)
Raag : kalyan
Lyrics : Varun Grover
Music: Anu Malik 
Singer: Papon Monalisa Thakur
On screen artist: Ayushman Khurana, Bhumi Pedhenkar
Production house: YRF (Yash raj Films) , Netflix
Link: https://youtu.be/JbDktrsnH40 (female version lyrical)
https://youtu.be/T-8vVY-IECk (male version with lyrics)
इस लिंक से गाने को सुना, देखा और गाया जा सकता है।
Meaning in English
Moh Moh Ke Dhage, Moh Moh Ke Dhage,
(The threads of love. The threads of love.)

Yeh Moh Moh Ke Dhage, Teri Ungliyon Se Ja Uljhe, Koi Toh Toh Na Lage, Kis Tarah Girah Ye Suljhe...(The threads of endearment are entangled in your fingers.The threads of affection are caught up in your fingers. I cannot find a way to untie the knot...)

Hai Rom Rom Iktara, Hai Rom Rom Iktara,
Jo Badalon Mein Se Guzre...(My life is like that star.My life is like that star that passes through the clouds...)

Tu Hoga Zara Pagal Tune Mujhko Hai Chuna,
Kaise Tune Ankaha, Tune Ankaha Sab Suna,
Tu Hoga Zara Pagal Tune Mujhko Hai Chuna..(You must be a little crazy to have chosen me.H How did you hear my unspoken words?You have to be a bit crazy to have me chosen...)

Tu Din Sa Hai Main Raat, Aa Na Dono Mill Jayein Shamon Ki Tarah,
Yeh Moh Moh Ke Dhage, Teri Ungliyon Se Ja Uljhe, Koi Toh Toh Na Lage, Kis Tarah Girah Ye Suljhe...(You ‘re like the day, and I’m like the night.Let’s get together like the evenings.)


Ki Teri Jhooti Batein Main Sari Man Loon, Ankhon Se Tere Sach Sabhi, Sab Kuch Abhi Jaan Lu, Ki Teri Jhooti Batein Main Sari Man Loon...(I’m going to believe even if you lie to me.I will know all the facts from your eyes.I’m going to believe even if you lie to me.)

Tez Hain Dhara Behte Se Hum Awara, Aa Tham Ke Sanse Le Yahan,(The flow is fast, and we’re floating aimlessly.Let’s stop for a while and get some rest.)

Yeh Moh Moh Ke Dhage, Teri Ungliyon Se Ja Uljhe, Koi Toh Toh Na Lage, Kis Tarah Girah Ye Suljhe...(Threads of love are caught in your fingertips.I can’t find a way to unite the knot.)


[Male Version lyrics that are different from female version are :  ]


Ki Aisa Beparwah Mann Pehle Toh Na Tha,
Chitthiyon Ko Jaise Mill Gaya, Jaise Ik Naya Sa Pata, Ki Aisa Beparwah Mann Pehle Toh Na Tha,(My heart was never as carefree as now.L Likea letter that found a new address. My heart has never been as carefree as it is now.)

Khali Rahein Hum Aankh Moonde Jayein,
Pahunche Kahin Toh Bewajah..(We walk on empty roads with our eyes closed. Ending up in a faraway place. Aimlessly!)


अगर संगीत के नोटेशन्स के साथ इसे गाना या बजाना चाहें तो youtube का ये लिंक काफी मददगार होगा https://youtu.be/NtNgvnQXa58music नोटेशन्स इसमेंmusic notation youtube link हैं। 

अगर piano हारमोनियम या keyboard सीखना चाहें तो इस लिंक से मदद मिल सकती है। https://youtu.be/xwRpsrX-xa4 

एक सारंगी वर्शन भी है, ये भी सुनियेगा अच्छा लगेगा , Sarangi version :  https://youtu.be/YQZ6ENaeWxc


Tuesday, March 2, 2021

Dil diya gallan ...दिल की बातें..

दिल दी यां गल्लां....एक पंजाबी प्रेमगीत जो कि एक टिपिकल व्यावसायिक हिंदी फिल्म में आया और सुपरहिट रहा। सुपरस्टार सलमान और खूबसूरत कटरीना कैफ़ की फिल्म होने के कारण फ़िल्म और गानों ने करोड़ों का ध्यान खींच पाया ...
और शायद ऐसा प्लेटफार्म मिलने की वजह से बहुत लोकप्रियता हासिल हुई और गाना सुपरहिट रहा। । वरना कहीं और किसी दूसरे पलटफॉर्म में आया  होता तो ऐसा अटेंशन नहीं मिल पाता। 
खैर जो भी हो गाना बहुत ही खूबसूरत है। इसकी लिरिक्स पंजाबी में है और इसका अर्थ बहुत ही अच्छा , सरल और खूबसूरत है, पता नहीं कैसे लिख इरशाद कामिल ने, म्यूजिक और धुन ने इसे और भी खूबसूरत बनाया है। शोर से भरे DJ songs के दौर में ये गाना एक contrast है। गाने का चित्रांकन भी ठीक ठाक है और गाने का मूल रस लेने में distract नहीं करता । धुन संगीत शब्दद गायकी और म्यूजिक अरेंजमेंट काफी अच्छे है। व्यक्तिगत तौर पे मुझे बहुत पसंद है और आशा है आपको भी पसंद आएगा। 
ये एक छोटा सा बैकग्राउंड है 3 मिनट का जो गाने किंख़ूबसुर्ती बयान करता है 

पूरा गाना इस gaana.com की लिंक से फ्री में भी online  सुना जा सकता है। https://gaana.com/song/dil-diyan-gallan-8

कच्ची डोरियों, डोरियों, डोरियों से ही, 
मैनु तू बांध ले,
पक्की यारीयों, यारीयों, यारीयों में,
होंदे ना फासले..
( Meaning: tie me with weak threads,
there are no distances in true love.)

ये नाराज़गी कागज़ी सारी तेरी,
मेरे सोह्णेया सुन ले मेरी,
दिल दियां गल्लां,
करांगे नाल नाल बह के
आँख नाले आँख नू मिला के...
( all this anger of yours is just for show,
O my beloved, listen to me,
we'd sit together,
look into each other's eyes,
and talk the talk of our hearts.)

दिल दियां गल्लां हाय
करांगे रोज़ रोज़ बह के
सच्चियाँ मोहब्बतां निभा के..
(talks of our hearts,
we'd have everyday,
living in true love.)

सताये मैनु क्यों
दिखाए मैनु क्यों
ऐवें झूठी मुट्ठी रूस के रूसा के..
(why do you torment me,
why do you fake all this anger.)

दिल दियां गल्लां हाय
करांगे नाल नाल बह के
आँख नाले आँख नू मिला के..

तेनु लाखां तों छुपा के रखां,
अक्खां ते सजा के तू ऐ मेरी वफ़ा,
रख अपना बना के
मैं तेरे लइयां 
तेरे लइयां यारा
ना पाविं कदे दूरियां..
(I'd keep you hidden from millions,
keep you adorned in my eyes,
you are my love,
keep me as your own.
I'm for you, for you, O beloved.
Let's never be far away.)

तेनु लाखां तों छुपा के रखां
अक्खां ते सजा के तू ऐ मेरी वफ़ा
रख अपना बना के
मैं तेरे लइयां 
तेरे लइयां यारा
ना पाविं कदे दूरियां ..

मैं जीना हाँ तेरा
मैं जीना हाँ तेरा
तू जीना है मेरा
दस लेना की नखरा दिखा के..
(I'm your life,
and you're my life.
what'd we get by throwing tantrums for each other.)

दिल दियां गल्लां
करांगे नाल नाल बह के
आँख नाले आँख नू मिला के

दिल दियां गल्लां..

रातां कालियाँ, कालियाँ, कालियाँ ने,
मेरे दिल सांवले,
मेरे हानियां, हानियां, हानियां जे
लग्गे तू ना गले..
(the nights are dark and my heart goes dark too,
if, my beloved, you don't embrace me.)

मेरा आसमा मौसमां दी ना सुने,
कोई ख़्वाब ना पूरा बने,
(my skies don't listen to the weathers,
and no dream gets weaved completely.)

दिल दियां गल्लां
करांगे नाल नाल बह के
आँख नाले आँख नू मिला के..

पता है मैनु क्यों,  छुपा के देखे तू,
मेरे नाम से नाम मिला के,
(I know why, in hiding,
you write our names and look at them together)

दिल दियां गल्लां
करांगे नाल नाल बह के
आँख नाले आँख नू मिला के..
दिल दियां गल्लां...

Song Title - Dil Diyan Gallan
Movie - Tiger Zinda Hai
Director - Ali Abbas Zafar
Starring - Salman Khan, Katrina Kaif
Composer - Vishal-Shekhar
Singer - Atif Aslam
Lyricist - Irshad Kamil
Music Label - YFR Music

आशा है गीत बेहतर समझ आया होगा , सुनकर अच्छा लगा होगा। अपना कीमती फीडबैक ज़रूर दें। 

खैरियत पूछो...छिछोरे.. फ़िल्म का गीत भी सुनियेगा , वो भी एक बेहतरीन गाना है...ये रही लिंक https://gaana.com/song/khairiyat-happy

पढ़ने के लिए और अच्छा टेस्ट रखने के लिए धन्यवाद, शुक्रिया , Thank You!


Saturday, February 27, 2021

चंद्रशेखर आज़ाद :

जीवन:  चंद्रशेखर आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के  भाबरा नामक स्थान पर 23 जुलाई 1906 में हुआ था। और उनकी मृत्यु 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद में हुई थी।


  1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने चन्द्रशेखर को झकझोर कर रख दिया था । 1920 में 14 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर आजाद गांधी जी के असहयोग आंदोलन से जुड़े । 14 साल की ही उम्र में वह गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए। जज के सामने पेश होने पर जज ने जब चन्द्रशेखर से उनका परिचय पूछा तो चन्द्रशेखर ने जवाब में कहा- मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता है और मेरा निवास स्थान जेल है। चन्द्रशेखर को 15 कोड़ों की सजा सुनाई गई। हर कोड़े पर चन्द्रशेखर ने दर्द से कराहने के बजाए वन्दे मातरम और भारत माता की जय के नारे लगाए। इसके बाद से लोग चन्द्रशेखर तिवारी को चंद्रशेखर आजाद के नाम से पुकारने लगे थे। 


चंद्रशेखर आजाद कहते थे कि 'दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे' । उनके इस नारे को उस वक्त हर युवा रोज दोहराता था । वो जिस शान से मंच से बोलते थे, हजारों युवा उनके साथ जान लुटाने को तैयार हो जाता था ।

1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया । जिसके बाद राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (HRA) का गठन किया । चन्द्रशेखर आजाद भी इस दल में शामिल हो गए । अंग्रेजो द्वारा की जा रही क्रूरतम दमनात्मक कार्रवाइयों के बीच, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल और तीन अन्य मुख्य नेता रोशन सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिरी और अश्फकुल्ला खान की मृत्यु के बाद, 8-9 सितम्बर 1928 को नई दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला के पुराने किले परिसर में आजाद के नेतृत्व और भगत सिंह के प्रस्ताव पर राजगुरु, सुखदेव, भगवतीचरण वोहरा जैसे क्रांतिधर्मी युवाओं के साथ मिलकर रिपब्लिकन एसोसिएशन को हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन (HSRA) के रूप में पुर्नगठित किया गया। उन्होंने अपने संगठन ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के ‘द रिवोल्यूशनरी’ शीर्षक संविधान/घोषणा पत्र में ‘सोशलिस्ट’ शब्द जोड़कर (आजादी और क्रांतिकारी केवल साहस नहीं बल्कि वैचारिक लक्ष्य‘ ) हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (आर्मी)’ का गठन किया और कमांडर-इन-चीफ के तौर पर साफ ऐलान किया था, ‘हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत’ । 


'समाजवाद' के नाम पर भारत में प्रथम संगठन बनाने का श्रेय चंद्रशेखर आजाद को ही जाता है। वे इसके अध्यक्ष जीवनपर्यन्त 27 फरवरी 1931 तक रहे फिर यह संगठन ही बिखर गया किन्तु तब तक देश में स्वतंत्रता और समाजवाद की अलख जग चुकी थी। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन के स्थापना के समय क्रांति के लक्ष्य पर काफी बहस हुई अन्ततोगत्वा समाजवाद को अंतिम लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया। इसके घोषणा-पत्र को भारतीय समाजवाद का सबसे महत्त्पूर्ण दस्तावेज की संज्ञा दी जाय तो गलत न होगा। पहली बार दृढ़तापूर्वक किसी संगठन ने समाजवाद को अपना अंतिम लक्ष्य घोषित किया। इसके घोषणा पत्र में स्पष्ट शब्दों में लिखा है। .... ‘‘भारतीय पूंजीपति, भारतीय लोगों को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से विश्वासघात की कीमत के रूप् मे सरकार में कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है। इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएं अब सिर्फ समाजवाद पर टिकी हैं और यही पूर्ण स्वराज्य और सब भेदभाव खत्म करने में सहायक सिद्ध हो सकता है”।  इस घोषणापत्र को 1929 में ब्रिटानिया हुकूमत ने जब्त किया था। आमतौर पर किसी भी संगठन का घोषणापत्र उसके मुखिया की सोच को ही प्रतिबिम्बित करता है। इससे पता चलता है कि आजाद और उनके साथियों की समाजवाद में गहरी निष्ठा थी। वे स्वयं को समाजवादी कहना और कहलाना पसन्द करते थे, यद्यपि उनके लिये समाजवाद एक रूमानी व भाव-प्रवण अवधारणा हैं ।


आजाद भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के सर्वोच्च सेनापति थे। भगत सिंह जैसे बौद्धिक क्रांतिकारी ने उनके नेतृत्व में कार्य किया। भगत सिंह के समाजवादी लक्ष्य के लिए उनके साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने में आजाद को कभी हिचक नहीं हुई। क्रांतिकारी मन्मथनाथ गुप्त ने एक बार आजाद का मूल्यांकन करते हुए कहा था कि समाजवाद के जिस सोपान पर भगत सिंह अनेक पुस्तकों के गंभीर अध्ययन के बाद पहुंचे, आजाद वहां अपने जीवन से पहुंच गए थे। आजाद बौद्धिक दुनिया के थे ही नहीं। वह अति निम्न गरीब तबके से आए थे। उनके लिए लक्ष्य कर्म प्रधान था। शिव वर्मा तथा भगतसिंह से अंग्रेजी में उपलब्ध क्रांतिकारी साहित्य को सुनते और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में ढालकर क्रांतिकारी तथ्यपत्रों को छपवाकर बँटवाते थे। श्री शिव वर्मा ने लिखा है कि आजाद ने उनसे कार्ल माक्र्स की एक पुस्तक को दो बार पढ़वाकर सुना। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, प्रो0 यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, भगवान दास माहौर, सदाशिव मलकापुरकर, बटुकेश्वर दत्त, प्रो0 नंदकिशोर निगम, विजय कुमार सिंहा जैसे मनस्वी व मननशील क्रांतिकारी कभी भी आजाद का नेतृत्व नहीं स्वीकारते यदि वे चिन्तनशील व क्रांतिकारी दर्शन में गहरी समझ नहीं रखते या कोरे बंदूकची होते। आजाद ने कभी भी अनावश्यक हिंसा की पैरवी नहीं की। 30 जनवरी 1930 में बाँटे व शिव वर्मा द्वारा लिखे गए पर्चा ‘‘फिलाॅसफी आफ बम-बम का दर्शन’’ को अंतिम प्रारूप आजाद ने ही दिया था जिस पर पूरे देश में चर्चा हुई और क्रांतिकारी गतिविधियों का वैचारिक पक्ष स्पष्ट हुआ।

चन्द्रशेखर आज़ाद जातीयता के घोर विरोधी थे इसीलिए उन्होने अपना नाम बदल कर  चन्द्रशेखर तिवारी के बजाय चंद्रशेखर आज़ाद कर लिया था तथा जनेऊ तोड़कर फेक दिया था।  एक बार कानपुर में एक संगठन के लोगों ने चन्द्रशेखर आज़ाद की मूर्ति का अनावरण करने के लिए दुर्गा भाभी को आमंत्रित किया जो क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी थीं जिन्हें सभी क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के नाम से पुकारते थे। मूर्ति में चंद्रशेखर आज़ाद को जनेऊ पहने हुए दिखाया गया था। चन्द्रशेखर के मूर्ति रूपी शरीर पर जनेऊ देखकर दुर्गा भाभी ने कड़ी आपत्ति जताई और उन्होने कहा की आज़ाद मेरे सामने जनेऊ तोड़कर फेका था और तुम लोग इसे जातिवादी बना रहे हो। मै ऐसी मूर्ति का अनावरण नहीं कर सकती और दुर्गा भाभी बगैर मूर्ति के अनावरण किए ही वापस अपने घर लौट गयीं।

चंद्रशेखर आजाद स्वभाव से कठोर भी थे और सहज भी। उनका रहन सहन बहुत सादा था। खाना बिल्कुल रुखा सूखा पसंद करते थे। खिचड़ी उनकी सबसे पसंदीदा भोजन थी। वह अपने ऊपर एक रुपया भी खर्च न करते थे। ना उन्हें अपने नाम की परवाह थी और न ही परिवार की। एक बार भगत सिंह ने बहुत आग्रह कर उनसे पूछा था कि – “आजाद जी, इतना तो बता दीजिये, अपका घर कहाँ है और वहाँ कौन–कौन है? ताकि भविष्य में हम उनकी आवश्यकता पड़ने पर सहायता कर सकें तथा देशवासियों को एक शहीद का ठीक से परिचय मिल सके।” इतना सुनते ही आजाद गुस्से में बोले – “इतिहास में मुझे अपना नाम नहीं लिखवाना है और न ही परिवार वालो को किसी की सहायता चाहिये। अब कभी यह बात मेरे सामने नहीं आनी चाहिये। मैं इस तरह नाम, यश और सहायता का भूखा नहीं हूँ।” आजाद के इसी व्यक्तित्व के कारण हर किसी का शीश उनके लिये श्रद्धा से झुक जाता है। आजाद के माता–पिता की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी, पर देश पर मर मिटने को तैयार आजाद को परिवार की चिन्ता के लिये समय ही कहाँ था। उनके माता-पिता की उस स्थिति का पता गणेशशंकर विद्यार्थी को लगा तो उन्होंने 200 रुपये आजाद को देकर कहा कि इसे अपने परिवार वालो को भिजवा देना। किन्तु आजाद ने यह रुपये पार्टी के कामों में खर्च कर दिये। दुबारा मिलने पर विद्यार्थी जी ने रुपये भेजने के संबंध में पूछा तो आजाद ने हँस कर कहा – “उन बूढ़ा-बूढ़ी के लिये पिस्तौल की दो गोलियाँ काफी है। विद्यार्थी जी इस देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिन्हें एक समय भी रोटी नसीब नहीं होती। मेरे माता-पिता दो दिन में एक बार भोजन पा ही जाते है। वे भूखे रह सकते है, पर पैसे के लिये पार्टी के सदस्यों को भूखा नहीं मरने दूंगा। मेरे माता-पिता भूखे मर भी गये तो इस से देश का कोई नुकसान नहीं होगा, ऐसे कितने ही इसमें जीते मरते है।” इतना कहकर आजाद चले गये और विद्यार्थी जी केवल अचरज भरीं नजरों से उन्हें देखते ही रह गये।
आजाद के मन में भविष्य को लेकर बहुत सी अनिश्चिताऍ थी। गोलमेज सम्मेलन के दौरान यह निश्चय किया जाने लगा था कि कांग्रेस और अंग्रेजों के बीच में समझौता हो जायेगा। ऐसे में आजाद के मन में अनेक सवाल थे। उन्हीं सवालों के समाधान के लिये पहले वे मोतीलाल नेहरु से मिले किन्तु उनकी मृत्यु हो गयी और कोई समाधान नहीं निकला। इसके बाद वे जवाहर लाल नेहरु से मिलने के लिये गये। नेहरू ने आजाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे, जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आजाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आजाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स हत्याकांड में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की। आजाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नजदीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आजाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। भगत सिंह के साथ लाहौर में सांडर्स का वध करके लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया तो दिल्ली पहुंचकर असेंबली बमकांड को अंजाम दिया । अलबत्ता, असेंबली बम कांड में वे चाहते थे कि भगत सिंह की जगह कोई और बम फेंकने जाए । आजाद द्वारा इस बात पर जोर डालने का सबसे बड़ा कारण था कि उन्हें भगत से बहुत लगाव था और वे किसी भी कीमत पर उन्हें खो कर दल को कोई भी हानि नहीं पहुँचाना चाहते थे। किन्तु भगत सिंह के आगे उनकी एक ना चली और न चाहते हुये भी उन्हें अपनी सहमति देनी पड़ी। आजाद बहुत दुखी थे कि उनकी मनोदशा को उनके इन शब्दों से समझा जा सकता – “क्या सेनापति होने के नाते मेरा यही काम है कि नये साथी जमा करुँ, उनसे परिचय, स्नेह और घनिष्ठता बढ़ाऊ और फिर उन्हें मौत के हवाले कर मैं ज्यों का त्यों बैठा रहूं।” असम्बली कांड के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुनायी गयी। इस फैसले से आजाद को बहुत दुख हुआ। उन्होंने भगत सिंह को जेल से भगाने के लिये बम्बई में संगठन खड़ा किया। वहाँ पृथ्वीराज से मिलकर उसे बम्बई में संगठन का नेतृत्व करने का दायित्व देकर स्वंय भगत सिंह और उनके साथियों को छुड़ाने का यत्न करने लगे। इसी प्रयास को सफल करने के लिये आजाद ने सुशीला दीदी (आजाद की सहयोगी) और दुर्गा भाभी को गाँधी के पास भेज चुके थे। उन्होंने गाँधी को एक प्रस्ताव भेजा था जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि गाँधीजी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की फाँसी को मंसूख करा सके और चलने वाले मुकदमों को वापस ले सके तो आजाद भी अपनी पार्टी सहित अपने को गाँधी जी के हाथों में सौंप सकते है, फिर वे चाहे कुछ भी करें। आजाद पार्टी को भंग करने को तैयार हो गये थे। गाँधी से भी उन्हें कोई संतोषजनक जबाब नहीं मिला, जिससे दल को बड़ी निराशा हुई, फिर भी प्रयत्न जारी रखे गये।

आज़ाद की भेंट नेहरु से आनन्द भवन में हुई थी उसका जिक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैः– “आजाद मुझसे मिलने के लिये तैयार हुआ था कि हमारे जेल से छूट जाने से आमतौर पर आशाऍ बंधने लगी है कि सरकार और कांग्रेस में कुछ न कुछ समझौता होने वाला है। वह जानना चाहता था कि अगर कोई समझौता हो तो उसके दल के लोगों को भी कोई शांति मिलेगी या नहीं? क्या उसके साथ तब भी विद्रोहियों का सा बर्ताव किया जायेगा? जगह-जगह उनका पीछा इसी प्रकार किया जायेगा? उनके सिरों के लिये इनाम घोषित होते ही रहेंगे? फांसी का तख्ता हमेशा लटकता ही रहेगा या उनके लिये शांति के साथ काम-धंधे में लग जाने की सम्भावना होगी? उसने खुद कहा कि मेरा और मेरे साथियों का यह विश्वास हो चुका है कि आतंकवादी तरीके बिल्कुल बेकार है, उससे कोई लाभ नहीं है। हाँ वह यह भी मानने को तैयार नहीं था कि शांतिमय साधनों से ही हिन्दुस्तान को आजादी मिल जायेगी। उसने कहा कि आगे कभी सशस्त्र लड़ाई का मौका आ सकता है, मगर यह आतंकवाद न होगा।” यह कोई नहीं जानता कि इस नेहरु के इस वकत्व्य में कितनी सच्चाई है, लेकिन एक बात बहुत स्पष्ट है कि आजाद अपने लिये नहीं बल्कि अपने दल के साथियों के संबंध में बात करने गये थे।
विडंबना देखिए कि अपने अन्यतम साथियों- रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, शचींद्रनाथ सान्याल, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र नाथ लोहिड़ी, रोशन सिंह और योगेश चंद्र चटर्जी आदि के साथ मिलकर स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष संचालित करते हुए आजाद जिस समाजवादी व्यवस्था की स्थापना का सपना देख रहे थे, उनकी शहादत ने उन्हें उसे साकार करने से वंचित कर दिया । फिर उनकी शहादत के सोलह वर्षों बाद हासिल हुई आजादी के कर्णधारों ने उसे साकार करना गैरजरूरी मान लिया और यात्रा की दिशा ही विपरीत कर दी ।चन्द्रशेखर आजाद का पूरा व्यक्तित्व भेदभाव और उपनिवेशवाद विरोधी रहा, वे हर प्रकार के मानवजनित और मानवीय शोषण के विरुद्ध रहे। वे चाहते थे कि भारत आजाद होकर समाजवाद के पथ पर चले और दुनिया का सिरमौर बने किन्तु आजादी के इस महानायक व महायोद्धा का सपना अभी भी अधूरा है। आजाद सदैव अपने भारतीय जनमानस में प्रेरणा-पुरुष के रूप में जीवित, जीवांत और प्रासंगिक बने रहेंगे, उनके विचार और सपनों तथा उनकी अवधारणाओं की परिणति पर बहस होनी चाहिए।  देश के इतिहासकारों व बुद्धिजीवियों ने चन्द्रशेखर आजाद के साथ काफी अन्याय किया है। उनकी विचारधारा एवं वैचारिक अवदान पर कभी भी विमर्श नहीं किया । स्वतंत्र भारत में लिखे गए आजादी की लड़ाई के इतिहास में आजाद को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे।


हमने महात्मा गांधी के आजाद भारत के सपनो का भारत देखा, डा अंबेडकर के संविधान का भारत देखा, जिसका आज ये हालात हैं कि युवा नौकरी ना होने की हताश में, छोटा व्यवसायी अपने छोटे उत्पादन के महंगे उत्पाद को बाजार के सस्ते मांग को पूरा करने में विफल होने पर आर्थिक नुकसान के हताश में, किसान, किसानी की बेहतर और सस्ता औजार ना मिलने के मलाल में और अपने फसल की लागत के नुकसान में आत्महत्या कर रहा है । आज जरूरत है, चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के समाजवाद के सपनो का भारत बनाने की। जिससे हर बेरोजगार को रोजगार, हर व्यवसायी को मांग के अनुरूप सस्ता व अच्छा/टिकाऊ माल बाजार को दे सके, किसान को सस्ता व उन्नत औजार और उत्पादन की बेहतर कीमत मिल सके । रोजगारपरक, ज्ञानवर्धक और उपयोगी शिक्षा हो जिससे सबके अंदर भारतीयता की भावना हो, हम पहले भी भारतीय हैं और आखिर में भी भारतीय हैं । जंहा ना कोई हिन्दू हो ना मुसलमान, ना सिक्ख, ना ईसाई ! जंहा सब भारतीयता और भाईचारे के साथ खुशहाल/समृद्ध भारत के निर्माण में लगे हों । ये हमे समझना पडे़गा कि भारत के विकास के साथ ही हमारा विकास है । ऐसे  ही समाजवादी  भारत का निर्माण चाहते थे चंद्रशेखर तिवारी "आजाद" और भगत सिंह ।

References  ,  अजय असुर का लेेख,    times of india , और इनटरनेट, बाइजुByju

Friday, February 5, 2021

इब्तेदाये इश्क़ है, रोता है क्या, आगे आगे देखिए , होता है क्या?

Ted Turner:  टेड टर्नर  सीएनएन न्यूज़ अमेरिका के मालिक हैं, CNN अमरीका का एक बड़ा न्यूज़ मीडिया समूह है, इसी ने 24 घण्टे न्यूज दिखाने वाले चैनल  (Cable News Network)की शुरआत की थी। 
किसान आंदोलन पर सीएनएन ने जो न्यूज़ आर्टिकल लिखा है उसे रिहाना जैसे कई सेलेब्रिटीज ने ट्वीट कर react किया है जो पूरे वर्ल्ड में भयंकर वायरल हुआ है।
(टेड टर्नर ने 2016 में हिलेरी क्लिंटन को सपोर्ट किया था और 2020 में जॉय बिडेन को सहयोग दिया है.)

रिहाना समेत कई बड़े महत्वपूर्ण अमरीकन VIP CELEBRITIES लोगों ने किसान आंदोलन वाली इस खबर को ट्वीट कर react किया है।

अब इस भगदड़ के राजनीतिक मायने यह हैं कि प्रेजिडेंट बिडेन ने न तो भारतीय को अपने शपथ ग्रहण में बुलाया और न अब तक कोई औपचारिक बात की है, लेकिन बिडेन के समर्थक लगातार अमरीका में डंका बजा रहे हैं, जिन खबरों पर गोदी मीडिया चुप है चर्चा नही कर रही है उन विषयों पर बिडेन समर्थित मीडिया चर्चा शुरू कर चुकी है।

यहां के सोशल मीडिया क्रांतिकारी, कंगना रनौत और अन्य सोशल मीडिया आईटीसेल अपनी समझ से रिहाना, ग्रेटा, मिया को ट्रोल कर रहे हैँ लेकिन यह भूल जाते है कि ये अपने कर्मों से कहां कीलें गाड़ रहे है? 

टेड टर्नर का इतिहास देखेंगे तो ये ईरान का भी समर्थन करते हुए मिलेंगे तो उधर इजराइल का विरोध करते है।

अभी Joseph Robinette Biden को कुर्सी पर बैठे सिर्फ 15 दिन हुए हैं और असर दिखने लगा है। बिडेन न अभी तो CNN के हाथों खाली एक पत्थर सरकाया है, एक राजनीतिक समझ के अनुसार जल्द ही Brand मोदी घुटने टेकने पर मजबूर हो सकते हैं और किसान आंदोलन पर इन्हें U-Turn लेना पड़ सकता है।

इब्तदा-ऐ इश्क़ है, रोता है क्या?
आगे आगे देखिए होता है क्या....?

Note:-- टेड टर्नर ने एक बार बताया था कि वो स्वयं राष्ट्रपति बनना चाहते थे लेकिन उनकी बीवी ने कहा कि यदि उन्होंने इस टाइप का सोचा भी तो वो छोड़ कर चली जाएंगी। अर्थात ये जोरू के गुलाम निकले यदि असल देशभक्त होते तो बीबी को छोड़ कर भाग सकते थे और राष्ट्रपति बन सकते थे।😜
😆😆😆😆😆😆😆😆

Friday, January 15, 2021

बाज़ार से गुज़रा हूं खरीददार नहीं हूं..अकबर इलाहाबादी एक गज़ल

*दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ,*
*बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीददार नहीं हूँ..*

*ज़िन्दा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी,*
*हर चंद कि हूँ होश में, होशियार नहीं हूँ..*
(तलबगार= इच्छुक, चाहने वाला;  ज़ीस्त= जीवन; लज़्ज़त= स्वाद; )

*इस ख़ाना-ए-हस्त से गुज़र जाऊँगा बेलौस,*
*साया हूँ फ़क़्त, नक़्श बेदीवार नहीं हूँ..*
(ख़ाना-ए-हस्त=अस्तित्व का घर; बेलौस= लांछन के बिना;  फ़क़्त= केवल; नक़्श= चिन्ह, चित्र)

*अफ़सुर्दा हूँ इबारत से, दवा की नहीं हाजित,*
*गम़ का मुझे ये जो’फ़ है, बीमार नहीं हूँ..*
(अफ़सुर्दा= निराश; इबारत= शब्द, लेख; हाजित(हाजत)=आवश्यकता; जो’फ़(ज़ौफ़)= कमजोरी, क्षीणता)

*वो गुल हूँ ख़िज़ां ने जिसे बरबाद किया है,*
*उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ..*
(गुल= फूल;  ख़िज़ां= पतझड़; ख़ार= कांटा)

*यारब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से,*
*मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूँ..*
(महफ़ूज़=सुरक्षित; इनायत=कृपा;  तलबगार=इच्छुक)

*अफ़सुर्दगी-ओ-जौफ़ की कुछ हद नहीं “अकबर”,*
*क़ाफ़िर के मुक़ाबिल में भी दींदार नहीं हूँ..*
(अफ़सुर्दगी-ओ-जौफ़= निराशा और क्षीणता; क़ाफ़िर= नास्तिक;  दींदार=आस्तिक,धर्म का पालन करने वाला)

शायर: अकबर इलाहाबादी

यह गज़ल बहुत ही फेमस है, इतनी कि  कभी कभी हिंदी उर्दू भाषी लोगों में आम बोल चाल की भाषा में मुहावरे कि तरह प्रयोग हो जाती है। किन्तु समझेंगे तो पाएंगे कि पूरी गज़ल का कैनवस बहुत बड़ा है, और अर्थ बहुत सारे और बहुत ही गहरे निकलते हैं।

उनकी बहुत सी शायरी बड़ी अच्छी है।
जैसे कि  ये कुछ...
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा तक नहीं होती...

हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है, 
चोरी तो नहीं की है, डाका तो नहीं डाला है..
हर ज़र्रा चमकता है अनवर ए इलाही से,
हर सांस ये कहती है,  कि हम हैं तो खुदा भी है..

हर एक से सुना नया फसाना हम ने , 
देखा एक दुनिया में नया जमाना हमने..

जब ग़म हुआ चढ़ा ली दो बोतलें इकट्ठी,
मुल्ला की दौड़ मस्जिद, अकबर की दौड़ भट्ठी..

दर्द को दिल में जगह दो अकबर,
इल्म से शायरी नहीं होती...

जो कहा मैंने कि प्यार आता है मुझको तुम पर,
हंस के कहने लगे कि और आपको आता ही क्या है..

मजहबी बहस मैंने की ही नहीं, 
इतनी अक्ल मुझमें थी ही नहीं..

इश्क नाजुक मिजाज है बेहद, अक्ल का बोझ उठा नहीं सकता,
होश ए आरिफ की है यही पहचान, कि खुदी में समा नहीं सकता...

धन्यवाद!

Monday, January 4, 2021

दिल ही तो है न संग ओ खिश्त, दर्द से भर न जाए क्यूं? रोएंगे हम हजार बार, कोई हमें रुलाए क्यूं? ग़ालिब की अमर शायरी और उसका अर्थ and meaning

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूं..

ये ग़ज़ल मशहूर उर्दू शायर मिर्ज़ा गालिब की है, जिसका यहां अनुवाद करने की एक छोटी सी कोशिश की है। वैसे तो गालिब की ग़ज़ल के मायने हर पढ़ने वाले के हिसाब से अलग अलग होते हैं ये उनकी एक खासियत भी है।  फिर भी एक कोशिश है, शायद पसंद आए। 
ग़ालिब के शायरी की एक महत्वपूर्ण खूबसूरती और खासियत ये है कि वो आशावादी हैं, मुश्किल से मुश्किल हालात के चित्र खींचते समय भी वो आशावादी लगते हैं, भले ही भीषण दर्द त्रासदी मौत या बेवफाई का चित्र पढ़ने वाले के जेहन में पैदा करें।
 कालजयी शायरी और गजलें हैं ग़ालिब की क्यूंकि सोचिए की आज से 200 साल पहले लिखी गई शायरी या घाज़ल को पढ़ने के बाद यूं लगता है कि अरे ये तो मेरे हालात बयां कर रहे हैं, सो हर कोई इनके लिखे से अपना तादात्म्य बिठा लेता है।

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं

बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ

जब वो जमाल-ए-दिल-फ़रोज़ सूरत-ए-मेहर-ए-नीमरोज़

आप ही हो नज़्ज़ारा-सोज़ पर्दे में मुँह छुपाए क्यूँ

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह

तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

हुस्न और उस पे हुस्न-ए-ज़न रह गई बुल-हवस की शर्म

अपने पे ए’तिमाद है ग़ैर को आज़माए क्यूँ
वाँ वो ग़ुरूर-ए-इज्ज़-ओ-नाज़ याँ ये हिजाब-ए-पास-ए-वज़अ

राह में हम मिलें कहाँ बज़्म में वो बुलाए क्यूँ

हाँ वो नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वो बेवफ़ा सही

जिस को हो दीन ओ दिल अज़ीज़ उस की गली में जाए क्यूँ

‘ग़ालिब’-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ

शायर – गालिब
कठिन शब्द का अर्थ हिंदी में —
संग-ओ-ख़िश्त = पत्थर और ईंट
क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म = जीवन की क़ैद और दुःख का बंधन
निजात = छुटकारा, मुक्ति
दैर = मंदिर
हरम = मस्जिद
दर = दरवाज़ा, द्वार
आस्ताँ = चौखट
रहगुज़र = राह, पथ
ख़ुदा परस्त = ईश्वर को माननेवाला
दीन-ओ-दिल = धर्म और हृदय
अज़ीज़ = प्रिय
ग़ालिब-ए-ख़स्ता = दुर्दशाग्रस्त ग़ालिब
ज़ार ज़ार = फूट-फूटकर

translation —–
1.dil hi to hai na sang-o-khisht dard se bhar na aaye kyon?
2.royenge ham hazaar baar, koi hamein sataaye kyon?

Line 1/2 – The poet says it is only a heart and not some stone and bricks. Why will it not fill up with pain? With a sense of aggravated injury/anguish, the poet aggrieve that I am not made of stone and bricks that I don’t feel pain. Even my cup of pain brims. I will cry a thousand times. Why does someone want to keep tormenting me? The second line echoes the first line provoked sense of injustice in saying that I am crying endlessly for I am being subjected to torment. The couplet as with Ghalib most works can be directed at the beloved or at the rigors of the existence where each passing day brings new misery.

3.dair nahin, haram nahin, dar nahin, aastaan nahin
4.baithe hain rehguzar pe ham, ghair hamein uthaaye kyon?

Line 3/4 – The poet says it is not a temple, nor a mosque. It is neither a door, nor a home. It is a pathway (public road) that I am sitting on, why are the others making me get up? This couplet though simple can take multiple connotation, each elegant in it own way. Ghalib says that he is not in the temple, nor inside the mosque thus independent of any religious affiliations. Also he is not inside a household or a door thus free from the drudgery of married life and household and social mores. No one can accuse him of religious impropriety or trespassing, instead he is deliberately sitting on the public road and no one can remove him from here now. In just two lines, he has aimed at religious as well as social tie-ups and asked to be left alone in the middle of the street, with no faith and no relations or love. Why can’t I live like this? Why do you not let me live, out

5.jabwohjamaal-e-dil_faroz,soorat-e-meher-e-neem_roz
6.aap hee ho nazzaara_soz, parde mein munh chupaaye kyon?

Line 5/6 – The poet says when that beauty of yours is so brilliant that it shins up the admirer’s heart. Your face is like the mid-day sun, radiant and beaming and eye-blinding You are the one who is worth seeing, so why do you hide your face in the veil? Again multiple interpretations can be put forth. The poet says that your beauty is such a treat to watch but why do cover it with a veil? It can also be argued that poet is saying that your beauty is so brilliant and radiant that any unworthy person seeing you will be blinded by it and hence you actually don’t need to cover your face to protect your modesty for no unworthy can eye you directly. Ghalib being ghalib, one can also interpret that these lines are complaints to the Omnipotent one. Why does God need to hide his true self. Your one sight/miracle would be enough to make people go blind in devotion.

7.dashna-e-ghamzajaan_sitaan,naawak-e-naaz be_panaah
8.tera hee aks-e-rukh sahee, saamne tere aaye kyon?

Line 7/8 – This is an absolute play on words. The poet says that with those dagger pointed amorous glances that literally take one’s life away, those senses-pleasing grace, those haughty demeanor, those amorous behavior of yours is like rain of arrows from which there is no relief. The beloved with her subtle though flirty (not in a crude but as an artistic charm) and yet a bit overbearing manners evokes a deadly potency that there is no escaping them. The second line states that with such deadly charm, even the reflection of your beautiful face can not can not afford to come before you for it will be waylaid by its bewitching glance. Why do you risk yourself coming before the mirror and come face to face with it?

9.qaid-e-hayaat-o-band-e-gham asl mein dono ek hain
10.maut se pehle aadmee gham se nijaat paaye kyon?

Line 9/10 – After couple of heavy worded sher, this is simple on words but meaty on meaning. The poet laments that prison of life and the chains of sorrow are both in fact essentially the same thing. Why would man be released from pain before death? Ghalib in its brutal nakedness of human existence says that prison of human existence, the endless misery of being is fundamentally same (derive from same source) as continuous pain that afflicts the mortal soul. It is not possible to not have sorrow/pain in this existence of ours. Both go hand in hand. So why would a person be freed from this drudgery before death? Why would one expect so? There is no escaping this pain in our lives and the only escape is the eventual death.

11.husn aur uspe husn_zan rah gayee bulhawas ki sharm
12.apne pe ‘eitmaad hai, ghair ko aazmaaye kyon?

Line 11/12 – The poet says that beauty and on the top of it the smartness and intelligence that his beloved displays. The lusty stranger was able to keep his honour and not be ashamed. There is calm confidence on oneself, but why do you want to test the other? Ghalib says that his beloved is someone who is extremely beautiful not only physically but from the heart as well, and the intelligence and confidence she oozes that she does not get intimated by other watching her or be conscious of her mannerisms. Her supreme confidence (due to her personality) makes her indifferent to the surrounding so that the lusty admirer is able ogle at her without the risk of being caught by her eyes and hence be ashamed. You have confidence in yourself, but why do you test the strangers/others?

13.wahan wo ghuroor-e-iz’z-o-naaz yaaN yeh hijaab-e-paas-e-waz’a
14.raah mein ham mile kahaan, bazm mein wo bulaaye kyon?
Line 13/14 – The poet says over there, there is pride and vanity over the splendor and manners/grace. While over here there is modesty made possible due the respect and upright behavior. Where would we meet on the road? Why would she call me to the social gathering that she is having. Ghalib aware of the stark social differences between him and his beloved comments that while there self-esteem prevails due to their mannerisms and splendor, over here its humble rectitude and self respect. The difference is so bare, that why would he be invited to the social meeting happening at her place and there is no place where they can meet on the road away from the prying eyes so as not to risk public embarrassment.

15.haan wo naheen khuda_parast, jaao wo be_wafa sahi
16.jisko ho deen-o-dil ‘azeez, uskee galee mein jaaye kyon?

Line 15/16 – The poet says that yes she is not God-worshiper, she is unfaithful, agreed! One who loves his faith and his heart, why would they go to her street? Ghalib in conversation with some one (presumably the so called keepers of the faith/society). They warn the poet about his beloved’s Godless ways and lack of devotion, besides doubting her faithfulness to him as well. The poet with a hint of irritation says that “agreed, she is not god-fearing and its fine if she is unfaithful as well. Why (those who so call love their heart and faith) why do they frequent her street?” Ghalib in other ways hinting that he does not care about his heart and his faith, for he will continue to go after his beloved but those so called moral custodians themselves are aware and maybe frequenting her street and yet preach the exact opposite to him.

17.’ghalib’-e-khasta ke baghair kaun se kaam band hain?
18.roiye zaar-zaar kya, keejiye haay-haay kyon?

Line 17/18 – Since the wretched Ghalib is not more, what worldly activities have come to stop? Why weep bitterly? Why wail about it now? Ghalib (now dead) says that the normal activities of the world are going on as before, despite the end of this miserable existence. So why do you weep and moan and make a big matter about. The pleasures and the sorrows and the daily grind and the hustle bustle of life is still there. Why do you unnecessarily lament my departure?

Meaning of difficult words –
sang = stone
khisht = brick
dair = temple
haram = mosque
dar = gate
aastaan = abode
rehguzar = pathway
jamaal = beauty
faroz = shining/luminous
meher = sun
neem_roz = mid day
nazzaara_soz = beautiful/worth seeing
dashna = dagger
ghamza = amorous glance
jaan_sitaan = destroying life
naawak = a kind of arrow
aks = image
hayaat = life
band-e-gham = chains of sorrow
nijaat = release/liberation
husn_zan = good opinion of a person
bulhawas = slave of passions/very greedy
‘eitmaad = reliance/dependance
ghuroor = pride
iz’z-o-naaz = respect and beauty
hijaab = veil/modesty
paas = regard
waz’a = behavior
bazm = social gathering
parast = worshiper
deen = religion/faith
khasta = sick/injured
zaar-zaar = bitterly

Sunday, January 3, 2021

नया साल : इक बिराहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है...हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन, दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है....

मूलरूप से ये मिर्ज़ा ग़ालिब की बहुत ही फेमस गज़ल है, और जगजीत सिंह की आवाज़ में 1992 में मिराज नाम के एलबम में होने के बाद और भी ज्यादा मशहूर हुई है किन्तु मिराज़ में जगजीत सिंह की गायी गज़ल सबीर दत्त की लिखी हुई है जिसमें केवल अंतिम लाइन ग़ालिब की लिखी हुई है। और जगजीत को पसंद करने वालों को यही ज्यादा पसंद है। :

ग़ालिब की लाइनें कुछ यूं थी:

देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़ ,
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।
.... ग़ालिब

उश्शाक़ : प्रेमी , lovers
बुतों : idols,  beloved ones
फ़ैज़ : success, grace, फ़ायदा, कृपा
बरहमन : Brahmin,  Hindu Priest, fortune teller

Meaning : Let's see what favors Beloved gives to me, As Fortune Teller predict this year is very good for my successes

*हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,*
*दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है..*

और सबीर दत्त की लिखी तथा जगजीत सिंह की मिराज एलबम जो 1996 में आयी थी वो घज़ल कुछ यूं है: 

इक बरहामन ने कहा है के ये साल अच्छा है,
ज़ुल्म की रात बहुत जल्द ढलेगी अब तो,
आग चुल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो,

भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा,
चैन की नींद हर इक शख्स़ यहाँ सोएगा,

आँधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरस,
प्यार की फ़स्ल उगाएगी ज़मीं अब के बरस,

है यकीं अब न कोई शोर-शराबा होगा,
ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा,

ओस और धूप के सदमें न सहेगा कोई,
अब मेरे देस में बेघर न रहेगा कोई,

नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है,
रहनुमाओं ने कहा है के ये साल अच्छा है,

दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है...

-सबीर दत्त

ये youtube का वीडियो लिंक है, सुनिएगा आशा है अच्छा लगेगा  https://youtu.be/w7ZusnFG1bg