Friday, January 31, 2020

रोटी मेकर

ये रोटी मेकर खरीदना एक सपना था आज से 14–15 साल पहले इस ex बैचलर का। उन दिनों शुरुआती नौकरी में यूँ बिजी और अस्त व्यस्त रहते थे कि 5–8 टाइम खाना नहीं खा पाते थे क्योंकि खाने के वक़्त काम में व्यस्त , और फ्री भी रहे तो भूख नहीं, भूख लगी और टाइम भी है तो साला आस पास भोजनालय नहीं , रोटी चावल दाल सब्जी वाला खाना नहीं , और अगर कभी रहा भी तो हमारा बजट बिगाड़ देने वाला, सो बेस्ट ऑप्शन चुनकर समोसे से ही पेट भर लेते थे ये सोंचकर की रात में खाना खा लेंगे, इस तरह से बहुत से फुल मील को नाश्ते में बदल दिया। पर रात में होटल/ भोजनालय /टिफिन की ठंडी रबर की तंदूरी रोटी, मोटा चावल, तेल में तैरता आलू और अधपकी सब्जियां खाने का मन न होता। सुबह फिर ऑफिस पहुंचने की भागमभाग और दिनभर या कहूँ रात तक कभी न खत्म होने वाला काम।

फिर समझ आया कि रात का खाना चैन से खाया जा सकता है अगर घर पे गैस चूल्हा और बर्तन आदि हो तो। फिर घरवालों की कृपा दे किराए के एक कमरे वाले मकान के एक कोने में रसोई बन गयी और फिर बैचलर्स के भगवान कूकर की कृपा से फटाफट खाना बना लिया करते थे, और अच्छा बुरा जो बना पेट में डाल कर के बड़ी संतुष्टि मिलती थी , संतुष्टि के भी आगे महसूस होता था जैसे कि we are at heaven type!!!😊 तब जल्दी जल्दी दाल भात तो बना लेते थे, बस रोटियां बनाना बड़ा झंझट लगता था, अतः पतली तवा की रोटियों के लिए बड़ा तरस जाते थे जैसे कि कॉलेज के दिनों में सुंदर लड़कियाँ देखने को…और दिखे भी तो अपन से दूर दूर का नाता नई!😢 किसी के टिफिन या घर पर चपाती देखकर दिल अंदर से गा उठता था कि : मेरा चांद मुझे आया है नज़र!! और हां बैचलरी के उन दिनों में दिल करता था कि सुबह सुबह बिस्तर पर ही एक कप चाय मिल जाये तो जीवन धन्य हो जाये!

तब पतली तवा रोटी, और 1600 -1800 की ये रोटी मेकर हमारा सपना हुआ करती थी , क्योंकि टीवी पर इसके एड में रोटी पककर यूँ घमंड से फूल के , दो पाटों के बीच इठला के ऐसे बाहर निकलती थी कि क्या बताएँ, हमारे दिल पे छुरियां चल जाती थी..पर उस 1–2साल के पीरियड में हम 10000 की सैलरी से कभी इतने पैसे नहीं रोटी मेकर को दे पाए।

फिर वक़्त बदला , सैलरी बढ़ी, हम ठीक ठाक रोटी बनाना भी सीख लिए पर माँ और बहन जैसी पतली नर्म रोटी कभी बना नहीं पाए…पर हाँ होटलों में रोटी खा लेते थे और रोटी मेकर की ज़रूरत महसूस न हुई…पर घर वाले और यार दोस्त रोटी मेकर दिलाने पे ही तुले हुए थे, और हम कहे पड़े थे कि अब रोटी मेकर की ज़रूरत नहीं। पर अंततः रोटी मेकर का ज़िन्दगी में प्रवेश हो ही गया….

हुआ यूं कि शादी के बाद माँ अन्नपूर्णा के रूप में स्वादिष्ट खाना पकाने वाली हमारी परमानेंट रोटी मेकर ने आकर जीवन को पतली चपातियों और खुशियों से भर दिया। पर ज़ालिम ने हमारे bed tea का सपना 😢कभी कभी ही साकार किया है…😊 ….

….पर कभी कभी माँ के न होने और बीवी जी के बीमार होने पर सुबह-सुबह जब बेटे को टिफिन के लिए जल्दी से रोटी बनाकर देनी होती है तो हमारी हालत खराब हो जाती है…🙄😣😖 इन जालिम स्कूलों में बैचलर्स की माँ अन्नपूर्णा यानी मैगी नूडल्स भी allow नहीं है, और बेटा मैगी तो पसंद करता है पर टिफिन में ले जाना नहीं, क्योंकि मैडम की बात उसके लिए पत्थर की लकीर है, और exceptionally भी disobediant नहीं बनना चाहता और रो पड़ता है सो हम खुद को कभी कभी बेलन पाटा और तवे के बीच चक्रव्यूह में फंसे अभिमन्यु जैसा महसूस करते हैं और इस रोटी मेकर को भी भूले भटके मिस कर लेते है….☺️

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